जानिए नागा साधुओं के रहस्य (सौ.सोशल मीडिया)
Mahakumbh 2025: दुनिया के सबसे बड़े धार्मिक आयोजन को शुरु होने में जहां पर 10 दिन शेष बचे है वहीं पर महाकुंभ में हिस्सा लेने के लिए श्रद्धालुओं की तैयारियां जारी है। इसके अलावा महाकुंभ की शान कहे जाने वाले नागा साधु भी कुंभ मेले में शामिल होने के लिए पहुंचने लगे है।
महाकुंभ की जानकारी श्रद्धालुओं को समाचार के जरिए पता चल जाती है लेकिन नागा साधु तो सांसारिक दुनिया से अलग हिमालय की चोटियों पर एकांतवास में होते है उन्हें कैसे इस धार्मिक आयोजन की जानकारी होती है। चलिए जानते हैं नागा साधुओं के अनोखे रहस्य के बारे में…
1- कैसे पहुंच जाते है नागा साधु कुंभ में
महाकुंभ में शामिल होने के लिए नागा साधु बड़ी संख्या और अखाड़ों के साथ पहुंचते है हर किसी के मन में यही सवाल आता है कि, आखिर वे यहां पर किस तरह से पहुंचते है। 12 साल तक ब्रह्मचर्य का पालन करने के बाद नागा साधु दीक्षित होते है जहां पर वे दीक्षा लेने के लिए हिमालय की चोटियों पर तप करते है। 12 साल बाद महाकुंभ होने वाला है इसकी जानकारी नागा साधुओं को होती है लेकिन स्थान की जानकारी नहीं होती है।
इसे लेकर नागाओं के सभी 13 अखाड़ों के कोतवाल महाकुंभ से काफी पहले इस धार्मिक आयोजन की तिथि और स्थान की जानकारी देना शुरु करते है मुख्य साधुओं के जरिए दूरदराज में बसे साधुओं को सूचना मिल जाती है। योग से सिद्धियां पाए नागा साधुओं को महाकुंभ की जानकारी का पता ज्योतिष ज्ञान से भी हो जाता है दरअसल वे ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति के आधार पर महाकुंभ की जानकारी अनुमानित कर लेते है।
2- क्यों नागा साधु रहते है निर्वस्त्र
महाकुंभ में अक्सर हम नागा साधुओं को निर्वस्त्र ही देखते है इसके लिए साधुओं का दृष्टिकोण अलग ही बात कहता है। इसके अनुसार नागा साधुओं का कहना है कि, इंसान दुनिया में निर्वस्त्र आया है और संसार में प्राकृतिक रूप से ऐसे ही बिना कपड़ों के रहना चाहिए। इस वजह से नागा साधु कपड़ें नहीं पहनता है। इतना भी कहा जाता है कि, अगर कोई उनके साथ वस्त्र धारण करके आता है उनकी साधना में विघ्न पड़ता है। प्रकृति से जुड़कर नागा साधु हर कार्य को करते है। योग करके नागा साधु अपनी देह को इतना मजबूत कर देते हैं कि, हर परिस्थिति और जलवायु में वो निर्वस्त्र जी सकते हैं।
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3- शरीर पर धुनि लगाए होते है नागा साधु
यहां पर महाकुंभ में आने वाले नागा साधु धुनि लगाए होते है इसके लिए वे कुंभ मेले में डेरा जमाकर धुनि लगाते है औऱ इसकी राख को शरीर पर मलते है। कहा जाता है कि, धुनि की आग को साधारण आग नहीं कहा जाता है बल्कि यह सिद्ध मंत्रों के प्रयोग से सही मुहूर्त में जलाई जाती है। बिना आदेश के धुनि नहीं जलाई जाती है इसके लिए नागा साधु को उसके पास होना चाहिए। नागा साधु यह मानते हैं कि पवित्र धुनि के पास बैठकर अगर नागा साधु कोई बात बोल दे तो वो पूरी अवश्य होती है। जब नागा साधु यात्रा करते हैं तो धुनि उनके पास नहीं होती, लेकिन जहां भी ये अपना डेरा जमाते हैं वहां धुनि अवश्य जलाते हैं।