Navratri Day 9: बंगाल की दुर्गा पूजा में संधि पूजा क्यों होती है? 108 दीप, कमल और भगवान राम का क्या है महत्व?

Maa Chamunda Story: बंगाल की दुर्गा पूजा में संधि पूजा का विशेष महत्व है। जानिए महाष्टमी और महानवमी के संधिकाल में मां चामुंडा की पूजा का अर्थ और 108 दीपों व कमल से जुड़ी प्रचलित कथा के बारे में।
Navratri day 9 why sandhi puja 108 diyas lotus bengal.
संधिपूजा फोटो.सोशल मीडिया
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Highlights:

  • महाष्टमी के अंतिम और महानवमी के शुरुआती 24-24 मिनट में होती है संधि पूजा।

  • चंड-मुंड के वध की कथा से जुड़ा है मां चामुंडा का स्वरूप।

  • 108 दीपों और कमल के पीछे भगवान राम की भक्ति की कथा भी प्रचलित है।

Sandhi Puja Significance: नवरात्रि के नौ दिनों में हर दिन मां दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा की जाती है। वहीं, बंगाल की दुर्गा पूजा में महाष्टमी और महानवमी के बीच होने वाली संधि पूजा का विशेष महत्व है। यह पूजा तिथियों के संधिकाल में यानी अष्टमी-नवमी के संधिकाल के समय में की जाती है। यह समय मां दुर्गा की शक्ति के एक विशेष स्वरूप की आराधना के लिए महत्वपूर्ण है।

'संधि' का अर्थ है मिलन। बता दें कि संधि पूजा महाष्टमी के अंतिम 24 मिनट और महानवमी के शुरुआती 24 मिनट को मिलाकर कुल 48 मिनट के दौरान होती है। यह समय दोनों तिथियों के संधिकाल के रूप में जाना जाता है। इसकी शुरुआत और समाप्ति का वास्तविक समय पंचांग के अनुसार तय किया जाता है।

मां चामुंडा और चंड-मुंड के वध की कथा

पौराणिक कथाओं के अनुसार, संधि पूजा का संबंध देवी के चामुंडा स्वरूप से है। देवी महात्म्य में वर्णित कथा बताती है कि चंड और मुंड नाम के असुरों ने देवी पर आक्रमण किया था। तब देवी के उग्र स्वरूप से प्रकट हुईं काली ने दोनों असुरों का वध किया। इसके बाद देवी को चामुंडा नाम से जाना गया।

इसी कथा के कारण संधि पूजा के दौरान मां चामुंडा की आराधना की जाती है। भक्त इस पूजा को बुराई पर अच्छाई की विजय और देवी की शक्ति के रूप में देखते हैं।

संधि पूजा में 108 दीपक क्यों जलाए जाते हैं?

बंगाल में मनाई जाने वाली दुर्गा पूजा देश के अन्य क्षेत्रों में मनाई जाने वाली नवरात्रि की पूजा से अलग होती है। इसमें संधि पूजा के दौरान 108 दीपक जलाने की परंपरा है। पूजा के समय जलते दीपकों से पूरा पूजा स्थल रोशन हो उठता है।

हिंदू धर्म में 108 की संख्या का विशेष स्थान है। मंत्र जाप, हवन, फेरा से लेकर पूजा में चढ़ाई जाने वाली वस्तुओं तक, कई धार्मिक अनुष्ठानों में 108 संख्या का उपयोग किया जाता है। संधि पूजा में दीप जलाने को प्रकाश, शुभता और देवी की आराधना से जोड़कर देखा जाता है।

108 कमल और भगवान राम की कथा क्या है?

संधि पूजा में मां दुर्गा को 108 कमल अर्पित करने की भी परंपरा है। इसके पीछे बंगाली रामायण यानी कृतिवासी रामायण से जुड़ी कथा लोकप्रिय है।

कथा के अनुसार, रावण से युद्ध करने से पहले भगवान राम ने देवी दुर्गा की आराधना की थी। पूजा के लिए उन्होंने 108 नीले कमल जुटाए, लेकिन आखिरी समय में एक कमल कम पड़ गया। भगवान राम के नेत्रों की तुलना कमल से की जाती है। ऐसे में उन्होंने देवी को अपना एक नेत्र अर्पित करने का संकल्प लिया। उनकी भक्ति देखकर देवी प्रसन्न हुईं और उन्हें विजय का आशीर्वाद दिया।

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बंगाल की दुर्गा पूजा में संधि पूजा क्यों है खास?

संधि पूजा केवल दीपक जलाने या फूल चढ़ाने का अनुष्ठान नहीं है। इसमें देवी के चामुंडा स्वरूप की आराधना, चंड-मुंड के वध की कथा और 108 दीपों व कमलों की परंपरा एक साथ जुड़ती हैं। इस दौरान पूजा पंडालों में मंत्रोच्चार और ढाक की गूंज से वातावरण पूजनीय बन जाता है।

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