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अक्षय तृतीया पर करें 14 तरह का दान, दान और पूजा से साधक को अक्षय पुण्य प्राप्त

अक्षय तृतीया पर दान और पूजा का विशेष महत्व है। जानें 14 प्रकार के दान और इस दिन के धार्मिक महत्व के बारे में।

  • Author By manoj choubey | published By महाराष्ट्र डेस्क |
Updated On: Apr 10, 2026 | 06:28 PM
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Akola News: हिंदू धर्म में अक्षय तृतीया का विशेष महत्व है. इसे अत्यंत शुभ दिन माना जाता है. हर वर्ष वैशाख मास की शुक्ल पक्ष तृतीया तिथि को यह पर्व मनाया जाता है. इस दिन अबूझ मुहूर्त होता है, जिसका अर्थ है कि विवाह, गृह प्रवेश, भूमि पूजन, नए व्यवसाय की शुरुआत और अन्य मांगलिक कार्य बिना पंचांग देखे किए जा सकते हैं. वर्ष 2026 में अक्षय तृतीया का पर्व रविवार 19 अप्रैल को मनाया जाएगा. अक्षय तृतीया का पर्व धार्मिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है.

इस दिन किए गए दान और पूजा से साधक को अक्षय पुण्य प्राप्त होता है. यह दिन न केवल मांगलिक कार्यों के लिए शुभ है, बल्कि जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का मार्ग भी प्रशस्त करता है. अक्षय तृतीया के दिन दान को श्रेष्ठ माना गया है. वैशाख मास में सूर्य की तेज धूप और गर्मी के कारण शीतल जल और खाद्य पदार्थों का दान विशेष फलदायी होता है. धार्मिक ग्रंथों में इस दिन 14 प्रकार के दान का उल्लेख है. गौदान, भूमिदान, तिलदान, स्वर्णदान, घीदान, वस्त्रदान, अनाजदान, गुड़दान, चांदीदान, नमकदान, मधु शहद दान, मटकीदान, खरबूजादान, कन्यादान.

पूजा और व्रत का लाभ

इस दिन व्रत रखकर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करना अत्यंत शुभ माना जाता है. मान्यता है कि सच्चे मन से पूजा करने पर धन, समृद्धि, बुद्धि और विद्या का आशीर्वाद मिलता है. इस दिन सोने के आभूषण खरीदना भी अत्यंत शुभ माना जाता है. धार्मिक कथाओं के अनुसार, इसी दिन कुबेर देवता ने देवी लक्ष्मी से धन की कामना की थी और प्रसन्न होकर माता लक्ष्मी ने उन्हें अपार धनसंपत्ति और ऐश्वर्य का वरदान दिया.

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पौराणिक महत्व

त्रेतायुग का आरंभ मान्यता है कि अक्षय तृतीया के दिन त्रेतायुग का आरंभ हुआ था. द्वापर युग का समापन इसी तिथि पर द्वापर युग का अंत हुआ. महर्षि जमदग्नि के पुत्र भगवान परशुराम का जन्म इसी दिन हुआ. उन्हें चिरंजीवी माना जाता है. अक्षय कुमार का प्राकट्य ब्रह्माजी के पुत्र अक्षय कुमार का जन्म भी इसी दिन हुआ.

गंगा अवतरण

नारद पुराण के अनुसार, इसी दिन गंगा नदी स्वर्ग से प्रचंड वेग के साथ पृथ्वी पर अवतरित हुई. भगवान शिव ने अपनी जटाओं में गंगा को धारण कर उनके वेग को नियंत्रित किया और फिर गंगा कैलाश से प्रवाहित हुई.

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Published On: Apr 10, 2026 | 03:12 PM

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