पितरों के तर्पण में क्यों जरूरी है काला तिल (सौ.सोशल मीडिया)
Margashirsha Amavasya 2025 Upay: इस साल 20 नवंबर 2025, गुरुवार को मार्गशीर्ष अमावस्या पड़ रही है। हर महीने के कृष्ण पक्ष की अंतिम तिथि को अमावस्या पड़ती है। धर्मशास्त्रों में बताया गया है कि अमावस्या तिथि पर किए गए पूजा-पाठ, स्नान और दान से न सिर्फ पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है, बल्कि परिवार में सुख-समृद्धि भी बढ़ती है।
ऐसे में इस दिन पितरों को प्रसन्न करने के लिए काले तिल और जल के साथ तर्पण या जल देना अत्यंत शुभ एवं फलदाई माना गया है। ऐसे में अब सवाल है कि पितरों की आराधना में काले तिल का सर्वाधिक महत्व क्यों है? आइए जानते हैं इस बारे में।
हिंदू धर्मशास्त्रों में कहा गया है कि काले तिल पितरों को अत्यंत प्रिय और तृप्ति देने वाले माने गए हैं। मान्यता है कि काले तिल में सभी तीर्थों का पुण्य समाहित होता है। इसलिए जहां गंगा-यमुना जाना संभव न हो, वहां काले तिल मिला जल ही गंगा जल के समान फल देता है।
काले तिल में सूर्य और अग्नि की ऊर्जा होती है। पितर सूक्ष्म लोक में रहते हैं, उन्हें ठोस भोजन नहीं पहुंचता। काले तिल की सूक्ष्म ऊर्जा ही उन्हें शक्ति और तृप्ति प्रदान करती है।
ज्योतिष बताते है कि, काले रंग का संबंध शनि और यम से है। काले तिल चढ़ाने से पितृ दोष, कुल में आने वाली बाधाएं, संतान-दोष, धन-हानि आदि दोष मिटने के साथ ही उन्नति के द्वार खुलते हैं।
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काला तिल पितरों की आत्मा को शीतलता और शांति देता और मोक्ष प्राप्ति में सहायक होता है। इसलिए पितृपक्ष, अमावस्या या श्राद्ध में ‘तिलोदकं स्वधा नमः’ कहकर काले तिल मिश्रित जल अर्पित करने की परंपरा सदियों से चली आ रही है।
अमावस्या के दिन पीपल के पेड़ में जल देना और दीपक जलाना भी शुभकारी होता है।