किस दिन शुरू हो रही है चैती छठ? विधिवत व्रत से संतानप्राप्ति से लेकर आरोग्य का वरदान देंगी छठी मैया
Surya Dev Chhath Puja: चैत्र महीने में मनाया जाने वाला चैती छठ लोक आस्था का पावन पर्व है। इस व्रत में श्रद्धालु भगवान सूर्य देव और छठी मैया की पूजा कर संतान सुख, आरोग्य की कामना करते हैं।
- Written By: सीमा कुमारी
चैती छठ (सौ.AI)
Chaiti Chhath 2026 Date: सूर्य उपासना का महापर्व छठ हिंदू धर्म में विशेष महत्व रखता है। साल में दो बार सूर्य देव की उपासना का यह महापर्व मनाया जाता है। एक कार्तिक महीने और दूसरा चैत्र महीने में। इस साल 2026 चैत्र महीने में मनाई जाने वाली चैती छठ का महापर्व 22 मार्च से होकर 25 मार्च तक मनाया जाएगा
किन राज्यों में सबसे ज्यादा मनाया जाता है
प्राप्त जानकारी के अनुसार, चैती छठ का महापर्व मुख्य रूप से बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा श्रद्धा और धूमधाम से मनाया जाता है। यह चार दिवसीय त्योहार चैत्र महीने (मार्च-अप्रैल) में सूर्य देव और छठी मैया को समर्पित होता है, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु नदी-घाटों पर पूजा करते हैं।
आखिर चैती छठ क्यों मनाया जाता है?
पौराणिक मान्यताएं के अनुसार, चैती छठ मुख्य रूप से सूर्य देव और छठी मैया की उपासना का एक अत्यंत पवित्र चार दिवसीय लोकपर्व है, जो चैत्र माह में शुक्ल पक्ष की षष्ठी को मनाया जाता है।
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यह पर्व सुख, संतान प्राप्ति, आरोग्य और पारिवारिक समृद्धि के लिए भगवान सूर्य को अर्घ्य देकर मनाया जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यह व्रत राजा प्रियव्रत ने संतान प्राप्ति के लिए किया था, जिसे छठी मैया ने पूरा किया।
दूसरी पौराणिक कथा के अनुसार, महाभारत काल में द्वापर युग में सूर्यपुत्र कर्ण ने सबसे पहले सूर्य देव की उपासना कर यह व्रत शुरू किया था। वहीं, पांडवों की जीत के लिए द्रौपदी ने भी सूर्य षष्ठी व्रत किया था।
सूर्य और छठी मैया की पूजा के लिए समर्पित
चैती छठ सूर्य देव और उनकी बहन छठी मैया को समर्पित है। इस व्रत से निसंतानों को संतान सुख, परिवार में सुख-समृद्धि और बीमारियों से मुक्ति आरोग्यता प्राप्त होती है।
शुद्धता और प्रकृति के प्रति आभार प्रकट का प्रतीक
बताया जाता है कि, यह पर्व शुद्धता और प्रकृति के प्रति आभार प्रकट करने का प्रतीक है, जिसमें सूर्य की ऊर्जा और प्राकृतिक जल का महत्व है।
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चार दिवसीय का महापर्व है – नहाय-खाय से पारण तक
- नहाय-खाय: पहले दिन व्रती पवित्र स्नान कर सात्त्विक भोजन (कद्दू-भात) ग्रहण करती हैं।
- खरना: दूसरे दिन शाम को गुड़ की खीर का प्रसाद ग्रहण कर 36 घंटे का निर्जला उपवास शुरू होता है।
- संध्या अर्घ्य: तीसरे दिन डूबते सूर्य को अस्ताचलगामी अर्घ्य दिया जाता है।
- प्रातः अर्घ्य: चौथे दिन उगते सूर्य को अर्घ्य देने के साथ ही व्रत का समापन होता है।
चैती छठ का पर्व वसंत ऋतु के अंत में सूर्य की शक्ति और शरीर की शुद्धि के लिए वैज्ञानिक और आध्यात्मिक दोनों रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है।
