लट्ठमार होली(सौ.सोशल मीडिया)
Lathmar Holi: हिंदू धर्म में होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि आस्था, उल्लास और परंपरा का महापर्व है। यह फाल्गुन पूर्णिमा के दिन पूरे भारत में उत्साह के साथ मनाया जाता है, लेकिन ब्रजभूमि में इसकी रौनक कुछ अलग ही देखने को मिलती है।
यहां होली की शुरुआत बसंत पंचमी के दिन से हो जाती है और इस उत्सव का सिलसिला करीब 40 दिनों तक चलता है। मंदिरों, गलियों और चौपालों में हर दिन रंग, गुलाल, भजन और रसिया की गूंज सुनाई देती है।
जानकारों के अनुसार, ब्रज की होली विश्वभर में प्रसिद्ध है, जहां हर दिन अलग अंदाज में उत्सव मनाया जाता है। इन्हीं में सबसे खास बरसाना और नंदगांव की लट्ठमार होली है, जो अपनी अनोखी परंपरा और राधा-कृष्ण की लीलाओं से जुड़ी मान्यताओं के कारण विशेष पहचान रखती है।
ब्रज भूमि में होली का उत्सव बसंत पंचमी से शुरू हो जाता है, लेकिन रंगों की असली धूम रंगभरनी एकादशी के बाद देखने को मिलती है। इसी समय से ब्रज में अलग-अलग परंपराओं के साथ होली खेली जाती है—कहीं लड्डूमार होली तो कहीं प्रसिद्ध लट्ठमार होली।
फाल्गुन शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को मनाई जाने वाली लट्ठमार होली का नज़ारा देखने के लिए हर साल देश ही नहीं, विदेशों से भी बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं।
पंचांग के अनुसार, इस वर्ष फाल्गुन शुक्ल नवमी तिथि 26 फरवरी 2026 को पूर्वाह्न 2:40 बजे तक प्रभावी रहेगी। इसी आधार पर 25 फरवरी 2026 को बरसाना में लट्ठमार होली खेली जाएगी।
इस बार बरसाना-नंदगांव की होली 26 फरवरी 2026 को मनाया जाएगा।
लट्ठमार होली की परंपरा राधा-कृष्ण की लोककथाओं से जुड़ी मानी जाती है। मान्यता है कि श्रीकृष्ण जब बरसाना पहुंचे और राधा जी को चिढ़ाया, तो सखियों ने लाठियां उठाकर उन्हें दौड़ा लिया। उसी घटना की याद में आज भी यह उत्सव उत्साह से मनाया जाता है।
ब्रज में मनाई जाने वाली लट्ठमार होली केवल उत्साह और रंगों का पर्व नहीं, बल्कि गहरी आस्था से जुड़ा आध्यात्मिक उत्सव है। इसमें नंदगांव के पुरुष और बरसाना की महिलाएं भाग लेकर राधा और कृष्ण की प्रतीकात्मक भूमिका निभाते हैं। महिलाएं लट्ठ से प्रतीकात्मक प्रहार करती हैं और पुरुष ढाल से बचाव करते हैं, जो एक पौराणिक प्रसंग की स्मृति को जीवंत करता है।
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धार्मिक दृष्टि से यह उत्सव प्रेम, समर्पण और भक्ति का प्रतीक माना जाता है। इस दौरान मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना, श्रृंगार दर्शन और कीर्तन आयोजित होते हैं। रसिया गायन और भजन पूरे वातावरण को भक्तिमय बना देते हैं, और श्रद्धालु इसे राधा-कृष्ण की कृपा प्राप्त करने का शुभ अवसर मानते हैं।