Premanand Ji Maharaj (Source. Pinterest)
Teachings of Premanand Ji Maharaj: जीवन में सफलता केवल धन, पद या प्रसिद्धि से नहीं मिलती, बल्कि सही संस्कार, अनुशासन और आंतरिक शुद्धता से प्राप्त होती है। श्री प्रेमानंद जी महाराज के अनुसार, जो व्यक्ति इन मूल बातों को नज़रअंदाज़ करता है, वह न सांसारिक सुख पा सकता है और न ही आध्यात्मिक उन्नति। महाराज जी बताते हैं कि कुछ आदतें ऐसी होती हैं, जो इंसान को जीवनभर पीछे ही रखती हैं।
आध्यात्मिक मार्ग हो या सामान्य जीवन, संयम सबसे मजबूत नींव है। देर से उठना, अव्यवस्थित दिनचर्या और खाने-पीने में लापरवाही साधक को भीतर से कमजोर बना देती है। महाराज जी कहते हैं कि गृहस्थ हो या सन्यासी, अगर जीवन में अनुशासन नहीं है तो प्रगति रुक जाती है। कठिन परिस्थितियों को सहन न कर पाना भी ईश्वर प्रेम की राह में बड़ी बाधा है।
श्री प्रेमानंद जी महाराज के अनुसार, आंतरिक और बाहरी पवित्रता दोनों अनिवार्य हैं। आजकल की कई आधुनिक आदतें पवित्रता में बाधा बन रही हैं। सही ढंग से शौच, स्नान और स्वच्छता का पालन न करने से साधना निष्फल हो जाती है। बिना भोग लगाए बाजार का भोजन करना, खड़े-खड़े खाना या सार्वजनिक स्थानों पर असंयमित आचरण करना भक्ति मार्ग में रुकावट पैदा करता है। छोटे-छोटे व्यवहार, जैसे सम्मान में गलत हाथ का प्रयोग, भी आध्यात्मिक नुकसान पहुंचाते हैं।
महाराज जी स्पष्ट कहते हैं कि कीर्ति, मान-सम्मान और पूजा की लालसा ज़हर के समान है। अगर साधक स्वयं को बड़ा समझने लगता है, तो वह अपने इष्ट से दूर हो जाता है। जो सम्मान मिलता है, वह ईश्वर की कृपा से मिलता है, न कि व्यक्ति की योग्यता से। सच्चा भक्त वह है जो किसी से द्वेष नहीं रखता, अपमान सहकर भी मन को शांत रखता है।
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गुरु के आदेश “लक्ष्मण रेखा” के समान होते हैं। जब तक बुद्धि गुरु वचनों के भीतर रहती है, तब तक माया का प्रभाव नहीं पड़ता। तर्क-वितर्क और अवज्ञा साधक को भ्रम में डाल देती है। धैर्य और स्थिरता के बिना साधना अधूरी रह जाती है।
आज के समय में मोबाइल, वेब सीरीज और व्यर्थ मनोरंजन वर्षों की साधना नष्ट कर देते हैं। महाराज जी कहते हैं कि ईश्वर का नाम-स्मरण ही सबसे बड़ी औषधि है। संकट में मनुष्यों या धनवानों पर नहीं, बल्कि केवल हरि पर भरोसा रखें।