

Premanand Maharaj Positive Thinking: आज का इंसान भागदौड़, पैसा और भोग-विलास में इतना उलझ गया है कि जीवन का असली उद्देश्य भूलता जा रहा है। संतों के अनुसार, यह मनुष्य जीवन बेहद दुर्लभ है, लेकिन अज्ञानता के कारण लोग इसे व्यर्थ की इच्छाओं में बर्बाद कर देते हैं। अक्सर लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि क्या पुराने पापों से मुक्ति मिल सकती है? इसका सरल उत्तर है हाँ। यदि व्यक्ति सच्चे मन से नाम जप करे और यह संकल्प ले कि वह दोबारा वही गलतियां नहीं करेगा, तो प्रभु उसे अवश्य क्षमा करते हैं।
श्री प्रेमानंद जी महाराज ने मन के विकारों को दूर करने के लिए पांच महत्वपूर्ण उपाय बताए हैं:
सत्संग को भगवान की सबसे बड़ी कृपा माना गया है। संतों के वचनों को सुनने से मन में सकारात्मकता आती है और बुरे विचारों से दूरी बनती है।
धार्मिक ग्रंथों और गुरु वचनों का नियमित अध्ययन करने से मन मजबूत होता है और सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिलती है।
अधिक भोजन करने से आलस्य और नकारात्मकता बढ़ती है, जबकि संतुलित और कम आहार से शरीर और मन दोनों स्वस्थ रहते हैं।
ब्रह्ममुहूर्त यानी सुबह 3-4 बजे उठकर भगवान का स्मरण करने से मन शांत होता है और बुरे विचार स्वतः खत्म होने लगते हैं।
जो भी करें, पूरे मन और ध्यान से करें। चाहे जप हो या ध्यान, एकाग्रता ही सफलता की कुंजी है।
महाराज जी के अनुसार, साधक तीन प्रकार के होते हैं।
गृहस्थ जीवन जीने वालों के लिए संदेश साफ है परिवार में रहें, प्रेम करें, लेकिन यह समझ रखें कि यह संसार स्थायी नहीं है। जीवन को ऐसे जिएं जैसे आप किसी मेहमान के घर आए हों। इससे मोह कम होगा और मन शांति की ओर बढ़ेगा।
भक्ति के मार्ग में सबसे बड़ा अवरोध है लोक-प्रतिष्ठा यानी नाम और शोहरत की चाह। यदि मन में यह इच्छा आ जाए कि लोग आपको संत या त्यागी कहें, तो यह आध्यात्मिक प्रगति को रोक देता है। साथ ही, पाखंडी और अहंकारी लोगों की संगति से भी दूर रहना जरूरी है।
सच्चा साधक वही है जो हर परिस्थिति में यह माने कि श्री जी की बड़ी कृपा है। जब इंसान अपने अहंकार को छोड़कर पूरी तरह प्रभु को समर्पित हो जाता है, तब जीवन में शांति, संतोष और सच्ची खुशी अपने आप आने लगती है।