'...तो जमानत मिलना आरोपी का हक', उमर खालिद केस को लेकर बोले पूर्व CJI DY चंद्रचूड़; निचली अदालतों को दी नसीहत

DY Chandrachud on Umar Khalid Case: देश के पूर्व CJI डीवाई चंद्रचूड़ ने जयपुर साहित्य उत्सव में एक बेहद अहम मुद्दे पर अपनी बात रखी। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि जब तक दोष सिद्ध नहीं हो जाता...
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जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ (सोर्स- सोशल मीडिया)
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Former CJI DY Chaandrachud: देश के पूर्व मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने जयपुर साहित्य उत्सव में एक बेहद अहम मुद्दे पर अपनी बात रखी। उन्होंने रविवार को साफ शब्दों में कहा कि जब तक दोष सिद्ध नहीं हो जाता, तब तक जमानत पाना हर आरोपी का बुनियादी अधिकार होना चाहिए। वरिष्ठ पत्रकार वीर संघवी के साथ बातचीत के दौरान उन्होंने उमर खालिद जैसे मामलों और न्याय प्रणाली की मौजूदा चुनौतियों पर खुलकर अपनी राय रखी।

पूर्व सीजेआई ने इस बात पर जोर दिया कि भारतीय कानून का आधार ही किसी व्यक्ति को निर्दोष मानने का अनुमान है। उन्होंने गहरी चिंता जताते हुए कहा कि अगर कोई व्यक्ति पांच या सात साल जेल में बिताने के बाद निर्दोष साबित होकर बरी होता है, तो उसके जीवन के उन खोए हुए सालों की भरपाई करना नामुमकिन है।

'...तो जमानत मिलना आरोपी का हक'

इस दौरान पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने यह भी स्पष्ट किया कि जमानत केवल तभी रोकी जानी चाहिए जब इस बात का डर हो कि आरोपी दोबारा अपराध करेगा, सबूतों से छेड़छाड़ करेगा या कानून से बचने की कोशिश करेगा। लेकिन यदि ऐसा नहीं हो तो जमानत मिलना उसका हक है।

राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ देरी का सवाल

बातचीत को आगे बढ़ाते हुए जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि जहां राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला आता है, वहां अदालतों को केस की बहुत गहनता से जांच करनी चाहिए। अगर ऐसा नहीं होता, तो लोग बिना वजह कई साल जेल में ही रह जाते हैं। उन्होंने भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में मामलों के निपटारे में होने वाली देरी को एक गंभीर समस्या बताया।

जिला और सेशन कोर्ट को नसीहत

उनका मानना है कि यदि न्यायिक प्रक्रिया लंबी खिंच रही है, तो आरोपी को जमानत मिलनी ही चाहिए। उन्होंने इस बात पर भी चिंता जताई कि जिला और सेशन कोर्ट अक्सर जमानत याचिकाओं को खारिज कर देते हैं, जिस वजह से ये मामले सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचते हैं और वहां बोझ बढ़ता है।

फैसलों का जिक्र, रिटायरमेंट की बात

पूर्व सीजेआई ने अपने कार्यकाल के कुछ ऐतिहासिक फैसलों का भी जिक्र किया, जैसे महिलाओं को सेना में स्थायी कमीशन, समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से हटाना और चुनावी बॉन्ड योजना को रद्द करना। उन्होंने सुझाव दिया कि जजों की नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने के लिए सिविल सोसाइटी के प्रतिष्ठित लोगों को शामिल किया जाना चाहिए।

रिटायरमेंट के बाद निजी जीवन का आनंद ले रहे चंद्रचूड़ ने वैवाहिक बलात्कार को अपराध के दायरे में लाने की वकालत की। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि उनके कार्यकाल में सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही का लाइव प्रसारण शुरू हुआ, जो अब संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल सभी भारतीय भाषाओं में उपलब्ध है।

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