National Doctors’ Day: सफेद कोट के पीछे छिपा मानसिक दबाव? जानिए डॉक्टरों और मेडिकल छात्रों के संघर्ष की कहानी
National Doctor’s Day 2026: डॉक्टर के सफेद कोट के पीछे एक ऐसी यात्रा छिपी होती है, जो भारी मानसिक दबाव और भावनात्मक तनाव से भरी होती है। मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी से लेकर पढ़ाई, नाइट शिफ्ट और मरीजों की मौत तक डॉक्टर की सच्ची कहानी।
- Written By: रीता राय सागर
मेडिकल प्रवेश परीक्षा की तैयारी कर रहे छात्रों से लेकर एमबीबीएस और पोस्टग्रेजुएट छात्रों तक, सभी को पढ़ाई, प्रैक्टिकल ट्रेनिंग, मरीजों की मौत, असाइनमेंट, नाइट ड्यूटी और लॉन्ग वर्किंग आवर जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। चिकित्सा का यह सफर मानसिक और भावनात्मक तनाव से भरा होता है।
डॉक्टर बनने का रास्ता आसान नहीं होता। मेडिकल कॉलेज में दाखिला लेने से पहले ही छात्रों के लिए ये परीक्षाएं ही उनकी पूरी दुनिया बन जाती हैं। ऐसे में यदि परीक्षा पेपर लीक जैसी घटनाएं सामने आती हैं, तो वर्षों की मेहनत, त्याग और उम्मीदें पलभर में टूट जाती हैं।
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मेडिकल कॉलेज में प्रवेश मिलने के बाद भी छात्रों का मानसिक दबाव कम नहीं होता, बल्कि कई गुना बढ़ जाता है। पढ़ाई और निजी जीवन के बीच संतुलन बनाना उनके लिए बड़ी चुनौती बन जाता है। समस्या विषय में नहीं है, बल्कि लगातार होने वाले टेस्ट, परीक्षाएं और शिक्षा से जुड़ी बड़ी उम्मीदें छात्रों में लगातार चिंता और बर्नआउट पैदा करती हैं।
अधिकांश मेडिकल संस्थान छात्रों के लिए सुरक्षित माहौल और काउंसलिंग की सुविधा उपलब्ध कराते हैं। मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं का समाधान तभी संभव है, जब पूरे संस्थान का सहयोग मिले। संस्थान में मेंटर-मेंटी प्रोग्राम, मानसिक स्वास्थ्य पर जागरूकता सेशन और विभिन्न कार्यशालाएं आयोजित की जाती हैं।
तनाव को कम करने के लिए गैर-जरूरी लेक्चर की संख्या कम की जाए और छात्रों को सेल्फ स्टडी के लिए अधिक समय मिलना चाहिए। साथ ही पाठ्यक्रम और परीक्षा कार्यक्रम इस तरह तैयार किए जाएं कि छात्रों को पर्याप्त आराम का समय भी मिल सके।
अधिकांश छात्रों के लिए एमबीबीएस केवल एक डिग्री नहीं, बल्कि जीवनभर का सपना होता है। लेकिन भविष्य के डॉक्टरों को तैयार करने की प्रक्रिया उनकी मानसिक सेहत की कीमत पर नहीं होनी चाहिए।
इस नेशनल डॉक्टर्स डे पर केवल सफेद कोट पहनने वाले डॉक्टरों का सम्मान करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन छात्रों को भी सहयोग, संवेदनशीलता और सुरक्षित माहौल देना जरूरी है, जो भविष्य में यह जिम्मेदारी निभाने वाले हैं।
छात्रों और शैक्षणिक संस्थानों दोनों का लक्ष्य ऐसा संतुलन बनाना होना चाहिए, जिससे मेडिकल करियर की चुनौतियों का सामना करते हुए कोई भी छात्र अपने सपनों की शुरुआत से पहले ही मानसिक रूप से टूटे नहीं।
