नागपुर की भूमी महामानव डॉ. भिमराव रामजी अंबेडकर की कर्मभूमी रही है। यही पवित्र दिक्षाभूमी पर अंबेडकर ने धम्मक्रांती की जिससे कोई भी अनजान नहीं। लेकिन आज हम एक ऐसी वास्तु से आपको रुबरु कराएंगे जिसमें महामानव सांसे ले रहे हैं।
जी हां... नागपुर से लगभग 15 किलोमीटर की दूरी पर एक वास्तु ऐसी है जहां शांति का वास है। वास्तु का नाम है 'शांतीवन चिंचोली'। इस जगह का इतिहास काफी पुराना रहा है। गोपिका बाई ठाकरे नामक माई ने तत्कालीन डॉ. अंबेडकर से सचिव वामनराव गोडबोले को यह जमीन दान स्वरुप दी थी।
यहां वामनराव गोडबोले ने शुरुआत में डॉ. अंबेडकर द्वारा स्थापित समता सैनिक दल और भारतीय बुद्धिष्ट महासभा का कार्यालय चलाया गया। डॉ. अंबेडकर के महापरिनिर्वाण के बाद इस जमीन ने डॉ. अंबेडकर को जिता-जागता महसुस किया है। बता दें कि यहा डॉ. बाबासाहब की अस्थियां हैं।
यहां की जमीन सिर्फ डॉ. बाबा साहब की अस्थियों से ही नहीं तो उनकी रोजमर्रा की अनगिनत ऐसी चिजों से पवित्र हुई है जिनका उपयोग डॉ. अंबेडकर ने किया था। हांलांकी पुरानी वास्तु को अब महाराष्ट्र सरकार के सहयोग से डेवलप किया गया है। मात्र यह वह ईमारत हैं जो डॉ. अंबेडकर को महसुस कर रही हैं।
अब आपको लिये चलते है इस पवित्र वास्तु के अंदर जहा महामानव से रुबरु होंगे! यहां आते ही आपको डॉ. अंबेडकर की अनुभूती होगी। डॉ. अंबेडकर पत्रकार भी थे। उनकी कई अखबार यहां दिखाई देंगे जो उनके सामाजिक, धार्मिक और राजनितीक कार्य की हमें पुनः याद दिलाते है।
भारत का संविधान- जिसे डॉ. बाबासाहब ने दिन रात एक कर लिखा, वह टाईपराईटर यहां आपकों दिखाई देगा जो बाबासाहब के संघर्ष की मिसाल देगा। यह वही टाईपराईटर है जिसने डॉ. अंबेडकर की उन बुलंद बाजुओं और उंगलियों छुआ है।
डॉ. अंबेडकर को आपने हमेशा सुट बुट टाय कोट में देखा होगा। ये वही कोट है जिन्हे महामानव को पवित्र बदन ने छुआ है। इन्ही को पहन कर कभी संविधान सभा में उन्होंने बुलंद आवाज में भाषण किया है तो कभी अपनी समाज को जाग्रत किया है। इन्हे देंखकर आप भावुक हो सकते हैं।
डॉ. बाबासाहब के पहले गुरु भगवान बुद्ध हैं। उन्होंने जाहीर तौर पर बौद्ध धम्म की दिक्षा भी ली है वो भी नागपुर की ही भुमी पर। किसी के सामने न झुकने वाले अंबेडकर इसी बुद्ध मुर्ती के सामने झुके हैं। इसी मूर्ति को नमन कर जीवन भर उन्होंने अपनी जीवन की पवित्रता बनाई।
यह वह कंबल है जिसे डॉ. अंबेडकर ने ओढने का सौभाग्य हासिल हुआ है। ये वो टाय है जो डॉ. अंबेडकर की स्वाभीमान भरी छाती पर रहकर खूद ही इतराई होगी। ये वही पैंट है जिसने एसी कमर को छुंवा है जो कभी किसी के सामने नहीं झुकी।
इन अस्थियों को देंखकर आपकी आंखे नम ही नही होगी तो भर आएंगी और आप को यह याद दिलाएगी की बाबासाहब हमें छोडकर चले गए हैं, तो वहीं आपको यह भी महसुस कराएगी की वह यही उनकी विचारधारा में आज भी जिंदा है।