जेएनयू मूवी रिव्यू: यूनिवर्सिटी में फैलाए जाने वाले वामपंथी विचारधारा पर प्रहार करती है उर्वशी रौतेला-पियूष मिश्रा स्टारर ‘जेएनयू’
तमाम तरह की अटकलों और कानूनी पचड़ों अक सामना करने के बाद फिल्म 'जेएनयू' आज सिनेमाघरों में रिलीज हुई. इसे देखने से पहले ये रिव्यू जरूर पढ़ें.
- Written By: आकाश जायसवाल
जेएनयू (Photo Credits: Instagram)
फिल्म: जहांगीर नेशनल यूनिवर्सिटी
कास्ट: उर्वशी रौतेला, सिद्धार्थ बोडके, रवि किशन, पीयूष मिश्रा, विजय राज, रश्मि देसाई
निर्देशक: विनय शर्मा
सम्बंधित ख़बरें
Maharashtra Weather: कहीं सूरज का सितम, कहीं बादलों की गरज; जानें आज आपके शहर का मौसम कैसा होगा?
IPL 2026 के आखिरी लीग मैच में दिल्ली कैपिटल्स की जीत, ईडन गार्डन्स में KKR को 40 रनों से दी करारी शिकस्त
UP के 19 बाहुबलियों पर चला हाईकोर्ट का हंटर! शस्त्र लाइसेंस पर योगी सरकार से मांगा जवाब- VIDEO
Gold-Silver Outlook: क्या इस हफ्ते सस्ता होगा सोना-चांदी…या रिकॉर्ड हाई पर चढ़ेगा भाव? जानें एक्सपर्ट की राय
निर्माता: प्रतिमा दत्ता
रनटाइम: 02 घंटे 30 मिनट
रेटिंग्स: 3 स्टार्स
कहानी: ये एक पॉलिटिकल ड्रामा फिल्म है जो दिल्ली के चर्चित यूनिवर्सिटी जहांगीर नेशनल यूनिवर्स में सेट गई है. फिल्म का लोकेशन ही नहीं बल्कि इसकी कहने भी इस यूनिवर्सिटी के इर्दगिर्द घुमती है. फिल्म में दिखाया गया है कि किस तरह यूनिवर्सिटी में वामपंथी विचारधारा का बोलबाला हिया और वे राष्ट्र विरोधी बातों को बढ़ावा देकर कई गलत विचारधारा का प्रचार करते हैं. ऐसे में सौरभ शर्मा (सिद्धार्थ बोडके) नाम का एक छात्र इसके खिलाफ मोर्चा खोलता है वामपंथियों से लोहा लेने निकल पड़ता है. उसकी इस लड़ाई में उसे अखिलेश पाठक उर्फ बाबा (कुंज आनंद) का सहयोग मिलता है जो उसका आगे बढ़ने में मार्गदर्शन करता है. उसके साथ ही ऋचा शर्मा नाम की महिला जिसका किरदार उर्वशी रौतेला ने निभाया है, उसे एक सहयोगी के रूप में मिलती है. सौरभ यूनिवर्सिटी में चल रहे चुनावों में हिस्सा लेकर उसे जीतता है और वामपंथियों के खिलाफ खुलेतौर पर अपनी लड़ाई का आगाज करता है. छात्रों के हित में लगातार काम करने के चलते वो विश्वविद्यालय में जॉइन सेक्रेटरी का पद भी हासिल करता है. फिल्म में जेएनयू में हुए कई विवादित मामलों को इस कहानी में पिरोह कर मेकर्स ने प्रस्तुत किया है.
अभिनय: फिल्म में सौरभ बोडके अपने किरदार में पूरी तरह से जचते हुए दिखे. एक परेशान लेकिन साहसी छात्र की भूमिका उन्होंने बखूभी निभाई है. वहीँ फिल्म में उर्वशी रौतेला ने भी काम से हमें इम्प्रेस किया है. अपनी खूबसूरती के अलावा वे सामाजिक मुद्दों पर अपने डायलॉग्स को मजबूती के साथ पेश करती दिखी. बाबा के रोल को कुंज आनंद ने बखूबी निभाया है वहीँ पियूष मिश्रा भी हमें अपने अंदाज से प्रभावित करते हैं.
फाइनल टेक: ‘जब जब धरती पर अधर्म बढ़ता है तो किसी न किसी को हथियार उठाना पड़ता है’ या ‘जेल जाना क्रांतिकारी की निशानी होता है’ जैसे प्रभावशाली डायलॉग्स हमें इस बात का एहसास कराते हैं कि किस प्रकार यूनिवर्सिटी में चल रही राजनीति छात्रों के मन में जहर घोल कर समाज को व्यवस्थित रूप से दूषित कर रही है. निर्देशक विनय शर्मा ने फिल्म में बताया कि किस प्रकार युवाओं को गलत विचारधारा से जोड़कर पूरे समाज को गलत दिशा में अपने निजी हित के लिए धकेल दिया जाता है. ये फिल्म वामपंथी विचारधारा की पोलखोलने तथा इसके खिलाफ आवाज उठाने का साहसी प्रयास करती है. फिल्म के कुछ सीन्स जरूरत से अधिक खींचे गए हैं जो इसे कुछ हद बोरियत से भर देते हैं. साथ ही इसकी कहानी को और भी संक्षिप्त रूप से एक मजबूत स्क्रीनप्ले के साथ कहा जा सकता था. अगर आप सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों से जुड़े विषय में दिलचस्पी रखते हैं तो आपको ये फिल्म एक बार जरूर देखनी चाहिए.
