Yavatmal में चार महीने में 102 किसानों की आत्महत्या, कर्ज और फसल संकट बना बड़ा कारण
Yavatmal Farmer Suicide Cases: यवतमाल में कृषि संकट गहराया: 4 महीने में 102 किसानों ने की आत्महत्या। कर्जबाजारी, फसल खराबी और सरकारी योजनाओं की विफलता बनी मौत का कारण। पूरी रिपोर्ट यहां पढ़ें।
- Written By: केतकी मोडक
प्रतीकात्मक तस्वीर (सोर्स: सोशल मीडिया)
Yavatmal Farmer Suicide Cases 2026: महाराष्ट्र के यवतमाल जिले से किसानों की दुर्दशा को उजागर करने वाली बेहद भयावह तस्वीर सामने आई है। लगातार फसल खराबी, कर्जबाजारी और अन्य आर्थिक कारणों से जिले में पिछले चार महीनों के भीतर ही 102 किसानों ने अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली है। जनवरी से अप्रैल 2026 के बीच जिले की विभिन्न तहसीलों में आत्महत्या की ये दुखद घटनाएं दर्ज की गई हैं। यह केवल सरकारी आंकड़े नहीं हैं, बल्कि 102 परिवारों के उजड़े हुए जीवन और चरमराती ग्रामीण अर्थव्यवस्था का सबूत हैं।
कुदरत की मार और कर्ज का बढ़ता बोझ
यवतमाल जिला मुख्य रूप से सूखा प्रभावित कपास उत्पादक क्षेत्र माना जाता है, जहां खेती पूरी तरह वर्षा पर निर्भर है और सिंचाई सुविधाओं की भारी कमी है। बेमौसम बारिश, सूखे जैसी स्थिति और खेती की बढ़ती लागत ने किसानों की आर्थिक कमर तोड़ दी है। इस क्षेत्र में बड़ी संख्या में आदिवासी और पिछड़े वर्ग के किसान रहते हैं, जो पहले से ही आर्थिक रूप से कमजोर हैं। ऐसी परिस्थिति में ऋण उपलब्धता में बाधाएं, महंगी बीज तकनीक का बढ़ता वर्चस्व, फसल चयन की स्वतंत्रता का अभाव तथा फसल बीमा योजनाओं के कमजोर क्रियान्वयन के कारण किसानों का मानसिक तनाव बढ़ रहा है और वे आत्मघाती कदम उठाने को मजबूर हो रहे हैं।
वर्ष 2001 से जारी है मौत का सिलसिला
जिला प्रशासन के आंकड़ों के अनुसार, जनवरी 2026 से अब तक कुल 102 किसानों ने आत्महत्या की है। मासिक आधार पर देखें तो जनवरी में 21, फरवरी में 28, मार्च में 24, अप्रैल में 27 तथा मई महीने में अब तक 4 आत्महत्याएं दर्ज हुई हैं। चिंताजनक बात यह है कि यवतमाल जिले में वर्ष 2001 से किसानों की आत्महत्या का यह सिलसिला निर्बाध रूप से जारी है और अब तक 6622 कर्जग्रस्त किसान अपनी जान दे चुके हैं। इसके बावजूद सरकार की चुप्पी गंभीर चिंता का विषय बनी हुई है।
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सरकारी योजनाएं जमीन पर पूरी तरह विफल
सामाजिक कार्यकर्ता किशोर तिवारी ने सरकारी योजनाओं की विफलता पर तीखे सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि सरकार द्वारा किसानों के लिए कई बड़ी योजनाओं की घोषणा तो की जाती है, लेकिन वे जमीनी स्तर तक नहीं पहुंच पातीं। नीतियों और उनके क्रियान्वयन के बीच की बड़ी खाई ही किसानों की मौत का कारण बन रही है। कर्ज व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है, फसल विविधीकरण को कोई प्रोत्साहन नहीं मिल रहा, बीज व्यवस्था महंगी और अनियंत्रित है तथा फसल बीमा योजना अविश्वसनीय साबित हुई है।
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एकीकृत उन्मूलन कार्यक्रम को लागू करने की मांग
जिले में बढ़ते कृषि संकट को देखते हुए ‘एकीकृत किसान आत्महत्या उन्मूलन कार्यक्रम’ को तत्काल प्रभाव से लागू करने की मांग जोर पकड़ रही है। किसानों का कहना है कि स्थिति में सुधार के लिए सभी किसानों को आसान ऋण सुविधा, कम ब्याज दर, फसल विविधीकरण के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की गारंटी, सस्ते और स्थानीय बीजों की उपलब्धता, पारदर्शी बीमा प्रणाली, सिंचाई और जलसंधारण परियोजनाओं को युद्ध स्तर पर पूरा करना तथा प्रभावित परिवारों को प्रत्यक्ष आर्थिक सहायता प्रदान करना अनिवार्य है। बिना इन उपायों के यवतमाल को इस संकट से बाहर निकालना संभव नहीं है।
