वनजमीन के बंटवारे और अलग सातबारा की मांग को लेकर किसान अनशन पर, संभाजी सरकुंडे ने दिया समर्थन

Umarkhed Farmers Protest: वनजमीन के अलग सातबारा और बंटवारे की प्रक्रिया दर्ज करने की मांग को लेकर उमरखेड़ में किसानों का आमरण अनशन शुरू हुआ। संभाजी सरकुंडे ने समर्थन दिया।
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किसानों का आमरण अनशन(सोर्सः सोशल मीडिया)
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Farmers Hunger Strike Umarkhed: भोगवटदार वर्ग-2 और वनजमीन की पीढ़ियों से चली आ रही आपसी बंटवारे की प्रक्रिया को राजस्व अभिलेखों में दर्ज कर प्रत्येक वारिस के नाम स्वतंत्र सातबारा देने, साथ ही हक छोड़ने और बंटवारे की प्रक्रिया पूर्ण करने की मांग को लेकर खरबी और बंदीटाकली के किसानों ने 13 अगस्त से उपविभागीय अधिकारी कार्यालय, उमरखेड़ के सामने आमरण अनशन शुरू किया है।

अनशन स्थल पर पूर्व आदिवासी विकास परियोजना आयुक्त संभाजी सरकुंडे ने पहुंचकर किसानों से मुलाकात की।

उन्होंने आरोप लगाया कि आदिवासियों के वनपट्टे उनके नाम करने में राजस्व अधिकारी जानबूझकर टालमटोल कर रहे हैं और कानून का पालन नहीं कर रहे हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि आदिवासियों को परेशान करने वाले अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज कराने की कार्रवाई की जाएगी।सरकुंडे ने कहा कि वर्ष 2006 के वनाधिकार कानून के तहत आदिवासियों को वनभूमि के अधिकार देने का प्रावधान है। इसके बावजूद राजस्व विभाग के अधिकारी यह कहते हुए जिम्मेदारी से बच रहे हैं कि वनपट्टे देने का अधिकार उनके पास नहीं है।

वनाधिकार कानून के तहत अलग सातबारा की मांग

उन्होंने आरोप लगाया कि आदिवासियों को लगातार टालमटोल वाले जवाब दिए जा रहे हैं, जबकि गैर आदिवासियों के मामलों में अधिकारियों द्वारा गुडफेथ के नाम पर काम किए जाने की बात कही जाती है। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता से पहले और स्वतंत्रता के बाद भी कई आदिवासी और गैर आदिवासी परिवारों को वनभूमि के पट्टे दिए गए हैं। वन क्षेत्र में दोनों समुदायों के लोग रहते हैं और दोनों को वनपट्टे मिले हैं। हालांकि, गैर आदिवासियों के नाम फेरफार किए गए, जबकि आदिवासियों के बंटवारा पत्रों के आधार पर फेरफार दर्ज नहीं किए गए। इससे आदिवासी किसानों के साथ अन्याय हुआ है।

किसानों के साथ उत्पीड़न

सरकुंडे ने आरोप लगाया कि वनाधिकार कानून लागू होने के बावजूद स्थानीय अधिकारी आदिवासी किसानों के अधिकारों को जानबूझकर नजरअंदाज कर रहे हैं। इसी कारण किसानों को अनशन का रास्ता अपनाना पड़ा है। उन्होंने कहा कि आदिवासी किसानों को उनके अधिकारों से वंचित कर गैर आदिवासियों के नाम सातबारा किए जा रहे हैं। अधिकारियों से इस संबंध में पूछताछ करने पर कुछ मामलों को ही गुडफेथ में किए जाने की जानकारी दी जाती है। यह आदिवासी किसानों के साथ एक प्रकार का उत्पीड़न है।

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कोई ठोस प्रतिक्रिया नहीं

उन्होंने कहा कि कानून के तहत पात्र आदिवासियों के वनपट्टों और बंटवारे के मामलों को तत्काल दर्ज कर उन्हें स्वतंत्र सातबारा उपलब्ध कराया जाना चाहिए। प्रशासन यदि किसानों की मांगों की अनदेखी करता है तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की तैयारी करनी पड़ेगी। खरबी और बंदीटाकली के किसानों का दो दिनों से अनशन जारी रहने के बावजूद प्रशासन की ओर से कोई ठोस प्रतिक्रिया नहीं मिलने पर सरकुंडे ने नाराजगी जताई।

उन्होंने प्रशासन से किसानों की मांगों पर तत्काल सकारात्मक निर्णय लेने की मांग की। इस अवसर पर तालुका कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष दत्तराव शिंदे, पूर्व नायब तहसीलदार उत्तम पांडे, खरबी के सरपंच सदानंद पांडे सहित अनशनकारी विलास आंबोरे, गणपत बोंबले, लक्ष्मण हराल, बालाजी राजने और संजय ढोले उपस्थित थे।

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