जनगणना का काम (सौजन्य-सोशल मीडिया)
Teachers Census Duty: शिक्षकों की हालत इन दिनों ‘काम करो या थको’ जैसी हो गई है। पिछले दो वर्षों से लगातार विधानसभा और लोकसभा चुनावों की ड्यूटी में पिस रहे शिक्षक अब एक बार फिर सरकारी आदेशों के शिकंजे में आ गए हैं। इस बार बहाना है जनगणना! नतीजा, गर्मी की छुट्टियां भी अब कागजों में ही सीमित रह जाने वाली हैं।
शिक्षा विभाग ने भले ही 2 मई से 14 जून तक ग्रीष्मकालीन अवकाश घोषित किया हो, लेकिन हकीकत इससे बिल्कुल उलट है। 16 मई से शुरू हो रहे जनगणना प्रशिक्षण और सर्वेक्षण कार्य ने शिक्षकों की छुट्टियों पर सीधा हमला बोल दिया है। यानी आराम के दिनों में भी अब फील्ड में पसीना बहाना तय है। शिक्षकों का गुस्सा अब खुलकर सामने आने लगा है।
उनका कहना है कि पिछले दो सालों से वे लगातार चुनावी कामों में उलझे रहे, मतदाता सूची सुधार से लेकर मतदान केंद्रों पर तैनाती तक। ऐसे में अब जनगणना जैसे भारी-भरकम कार्य का बोझ डालना सरासर अन्याय है।
मई-जून की तपती धूप में जनगणना का काम किसी सजा से कम नहीं माना जा रहा। चिलचिलाती गर्मी में घर-घर जाकर डेटा जुटाना न सिर्फ शारीरिक रूप से थकाऊ है, बल्कि कई बार स्वास्थ्य के लिए भी खतरा बन सकता है।
शिक्षक संगठनों ने इसे ‘अमानवीय कार्य योजना’ तक करार दिया है। कई शिक्षकों ने परिवार के साथ घूमने-फिरने या सामाजिक कार्यक्रमों की योजनाएं पहले ही बना ली थीं। टिकट बुक हो चुके थे, प्लान तय थे लेकिन अब सब रद्द! इससे मानसिक तनाव के साथ-साथ आर्थिक नुकसान भी झेलना पड़ रहा है।
जनगणना (कॉन्सेप्ट फोटो- सोशल मीडिया)
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शिक्षक संगठनों का साफ कहना है कि शिक्षकों को बार-बार गैर-शैक्षणिक कार्यों में झोंकना शिक्षा व्यवस्था के साथ खिलवाड़ है। जब शिक्षक ही थके और तनावग्रस्त रहेंगे, तो छात्रों की पढ़ाई पर असर पड़ना तय है। क्या हर बार सरकारी जिम्मेदारियों का बोझ सिर्फ शिक्षकों पर ही डाला जाएगा? क्या जनगणना जैसे महत्वपूर्ण कार्यों के लिए अलग तंत्र नहीं बनाया जा सकता? फिलहाल हालात यह हैं कि शिक्षकों के लिए गर्मी की छुट्टियां ‘आराम’ नहीं, बल्कि ‘एक और ड्यूटी’ बन चुकी है।