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भोजन पानी की तलाश में शहर की ओर जा रहे जंगली जानवर, वन विभाग ने बनाए 48 कृत्रिम जलाशय
- Written By: मनोज पांडे

File Photo
जलगांव: मौसम में आए दिन हो रहे बदलाव और तेज गर्मी के कारण पारा चढ़ने से जिले के अधिकांश हिस्सों में जलस्रोत सूख गए हैं। इसलिए, वन क्षेत्र में जंगली जानवर पानी और भोजन की तलाश में मानव बस्तियों की ओर आने लगे हैं। जलगांव वन विभाग के अधिकारियों ने बताया कि जलगांव जिले के वन क्षेत्र के भीतर 48 कृत्रिम जलकुंड बनाए गए हैं ताकि जंगली जानवर अपना आवास छोडकर शहरों की ओर न बढें। जंगल में गर्मी के दिनों में और जनवरी से फरवरी के दौरान प्राकृतिक जल स्रोत सूख जाते हैं। जंगल में कहीं भी पानी उपलब्ध नहीं होने पर जंगली जानवर जंगल छोड़कर मानव बस्तियों में भटकते पाए जाते हैं।
जंगलों और बांधों में पानी के स्रोत सूख गए
जिले में जलगांव वनक्षेत्र के अंतर्गत शिरसोली, म्हसावद, एरंडोल नजीक पद्मालय, पाचोरा, भडगाव अंतर्गत नांद्रा के साथ भडगाव तहसील के गोंडगाव, कजगाव तरवाडे जंगली इलाके हैं जहां चिंकारा, मोर, तेंदुए, जंगली सुव्वर, बंदर, खरगोश, लोमडियां, तरस, भेडिये, आदि वन्यजीव प्रजातियां पाई जाती है। इसके अलावा मुक्ताईनगर चारठाणा, वड़ोदा के साथ आड़वड़, धनोरा, बिडगांव शेतशिवार जंगली जानवरों का बसेरा है। सतपुड़ा पर्वत तेंदुओं सहित वन्यजीवों का घर है। जंगलों और बांधों में पानी के स्रोत सूख गए हैं, इसके चलते जंगली जानवर पानी के लिए पलायन कर रहे हैं। जंगली जानवरों के ग्रीष्मकालीन प्रवास को रोकने के लिए हर साल वन विभाग द्वारा उपाय किए जाते हैं। इसी तरह इस साल भी वन विभाग ने वन्य प्राणियों के लिए छोटे-छोटे कृत्रिम जलकुंड बनाकर जंगल में पीने के पानी की व्यवस्था की है। वन अधिकारियों ने कहा कि इससे कुछ हद तक जंगली जानवरों के भटकने पर रोक लगाने में मदद मिलेगी।
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सिमेंट के बांध सूखे
सतपुड़ा क्षेत्र में करीब 20 हजार हेक्टेयर वन क्षेत्र जंगली जानवरों का निवास है। साथ ही जलगांव उप वन क्षेत्र जलगांव, पाचोरा, जामनेर व अन्य क्षेत्रों में तेंदुए, तरस, भेड़िये, बंदर व अन्य पशु-पक्षी अपनी प्यास बुझाने के लिए 10 किमी दूर शहरी क्षेत्र में पहुंच रहे हैं। इसलिए अडावद, खर्डी, वर्डी, धानोरा आदि में जंगली जानवर रोज देखे जाते हैं। पिछले एक सप्ताह में भेड़ियों के हमले में किसानों के घायल होने की घटनाएं हो रही हैं। सतपुड़ा रेंज में हर दिन जंगल में आग लगती है। बढ़ते तापमान में आग बुझाना बहुत कठिन काम है और या तो आधुनिक मशीनरी का इस्तेमाल करना पड़ता है। साथ ही इस क्षेत्र में वन मजदूरों व वन कर्मचारियों को पीने का पानी भी नहीं मिलता है। कर्मचारियों को पानी के लिए 10 से 12 किमी पैदल चलकर जाना पड़ता है। अडावद वन क्षेत्र में वन तालाब नहीं है, केवल सीमेंट के बांध हैं, लेकिन उनमें बहने वाला पानी सूख गया है। साज्ञादेव और गंधारपाड़ा क्षेत्र में प्राकृतिक जल निकाय हैं।
[blockquote content=”जंगली जानवरों को अपना वनवास छोड़कर भोजन और पानी की तलाश में मानव बस्तियों में आने से रोकने के लिए वर्ष 2022-23 के तहत यावल वन विभाग के साथ जिले भर में लगभग 43 कृत्रिम प्रहरी बनाए गए हैं। इस मानव निर्मित जलसेतु में हर 5 से 7 दिन में आवश्यकतानुसार टैंकरों से पानी की आपूर्ति की जा रही है। किनारों से पानी पीने के लिए पत्थरों का भी इस्तेमाल किया गया है ताकि हिरण, तेंदुआ या अन्य जानवर विस्तृत कृत्रिम जल निकायों में प्रवेश न करें और पानी को प्रदूषित न करें।” pic=”” name=”विवेक होशिंग, उपवनसंरक्षक, जलगांव”]
Wild animals going towards the city in search of food and water forest department made 48 artificial reservoirs
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