

Wardha Tiger Attack: वर्धा जिले के सेलू तहसील के रायपुर जंगली निवासी किसान भगवान धुर्वे की बाघ के हमले में मौत ने वन्यजीवों के बढ़ते खतरे और प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। वन्यजीव के हमले में मृत्यु होने पर शासन की निर्धारित प्रक्रिया के तहत मुआवजा देने का प्रावधान है।
इसके बावजूद धुर्वे की मौत अब मानवीय संवेदना से अधिक राजनीतिक खींचतान का विषय बनती दिखाई दे रही है। नतीजा यह है कि जिस परिवार को तत्काल आर्थिक और मानसिक सहारे की जरूरत है। वह पांच दिनों से अंतिम संस्कार के लिए शव की प्रतीक्षा कर रहा है।
राकां शरद पवार गुट के सांसद अमर काले ने मामले में हस्तक्षेप करते हुए मृतक के परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी और 25 लाख रुपए मुआवजा देने की मांग की है। नौकरी नहीं दिए जाने पर एक करोड़ रुपए मुआवजे की मांग सामने रखी गई है। सवाल यह है कि क्या ऐसी मांग प्रशासनिक नियमों और उपलब्ध प्रावधानों के भीतर है? यदि नौकरी देने का प्रावधान ही नहीं है, तो फिर ऐसी मांग पर अड़कर शव को रोके रखना आखिर किसके हित में है? भगवान धुर्वे के परिवार में पत्नी और दो पुत्र हैं।
दोनों पुत्र रोजमजदूरी कर परिवार का भरण-पोषण करते हैं। ऐसे परिवार के लिए निर्धारित मुआवजा निश्चित रूप से महत्वपूर्ण सहारा हो सकता है। लेकिन मुआवजे की प्रक्रिया को राजनीतिक प्रतिष्ठा का प्रश्न बना देने से परिवार की पीड़ा कम नहीं होगी। उलटे अंतिम संस्कार में देरी से परिजनों की मानसिक परेशानी और बढ़ रही है। सबसे गंभीर पहलू यह है कि यह घटना पालकमंत्री डॉ. पंकज भोयर के निर्वाचन क्षेत्र में हुई है। इसलिए विपक्ष को सरकार को घेरने का अवसर मिल गया और सत्तापक्ष पर दबाव बनाने के लिए मुद्दे को राजनीतिक रंग दिया जा रहा है।
वन्यजीव हमले में एक किसान की मौत जैसी संवेदनशील घटना को राजनीति का अखाड़ा बनाने से न तो बाघ का खतरा कम होगा और न ही परिवार की समस्या हल होगी। सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि नौकरी का प्रावधान है या नहीं। यदि नहीं है, तो नियमों के अनुसार मिलने वाला मुआवजा तत्काल उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी प्रशासन की है।
वहीं जनप्रतिनिधियों से अपेक्षा है कि वे नियमों से बाहर की मांग पर अड़ने के बजाय पीड़ित परिवार को तत्काल राहत दिलाने के लिए प्रशासन पर दबाव बनाएं। पांच दिन तक शवागार में शव पड़ा रहना किसी भी संवेदनशील व्यवस्था के लिए गंभीर सवाल है। राजनीति बाद में भी हो सकती है। लेकिन मृतक का सम्मान और परिवार को तत्काल राहत पहली प्राथमिकता होनी चाहिए।