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वर्धा की आष्टी-शहीद तहसील के थार, बोरखेड़ी, बामर्डा, चामला, किन्ही, मोई, बोटोणा, मुबारकपुर और ठेका कोल्हा में जलसंकट गहरा गया है।
सामान्यतः दिसंबर-जनवरी तक पानी रहने वाली जाम नदी इस बार अक्टूबर में ही सूख गई। नाले और कुएं भी सूख चुके हैं।
पानी और चारे की कमी के चलते करीब आधे परिवारों और पशुपालकों के दीपावली के बाद दूसरे क्षेत्रों में जाने की तैयारी की जानकारी सामने आई है।
Wardha Drought Crisis: अल नीनो के प्रभाव और अत्यल्प बारिश के चलते जिले में सूखे का संकट गहराने लगा है। आष्टी-शहीद तहसील के 9 गांवों में हालात अभी से गंभीर हो गए हैं। आमतौर पर फरवरी-मार्च में सूखने वाली जाम नदी, नाले और कुएं इस बार अक्टूबर में ही सूख चुके हैं। पानी और चारे की कमी ने ग्रामीणों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा कर दिया है।
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए क्षेत्र के करीब 50 प्रतिशत परिवारों और पशुपालकों के दीपावली के बाद पलायन की तैयारी करने की जानकारी सामने आई है। वहीं, पानी के अभाव में आगामी रबी फसल की बुआई भी प्रभावित होने की आशंका है। हर साल दोहराए जाने वाले इस संकट के बावजूद स्थायी उपाय नहीं होने से ग्रामीणों में रोष है।
हर साल रहती है समस्या आष्टी-शहीद तहसील के थार, बोरखेड़ी, बामर्डा, चामला, किन्ही, मोई, बोटोणा, मुबारकपुर और ठेका कोल्हा गांवों में हर साल गर्मी के दौरान भीषण जलसंकट और चारे की किल्लत पैदा होती है। इन 9 गांवों का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 5,630 हेक्टेयर है, जिसमें से लगभग 4,567 हेक्टेयर भूमि पर खेती की जाती है।
करीब 10 हजार की आबादी वाले इन गांवों में फरवरी-मार्च से जलसंकट शुरू होकर अप्रैल-मई में विकराल रूप धारण कर लेता है। लेकिन इस साल कम बारिश के कारण संकट ने समय से पहले ही दस्तक दे दी है। क्षेत्र की जीवनरेखा मानी जाने वाली जाम नदी पूरी तरह सूख गई है।
वर्धा जिप CEO पराग सोमण ने कहा कि जिले में सूखे और चारे की किल्लत जैसी समस्याओं से निपटने के लिए जिला प्रशासन उपाययोजना कर रहा है। आष्टी तहसील के संबंधित गांवों से होने वाले पलायन को रोकने के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएंगे, शीघ्र ही संबंधित विभागों के साथ चर्चा व बैठक कर संकट से निपटने के लिए जरूरी उपायों पर जोर दिया जाएगा।
ग्रामीणों के अनुसार, क्षेत्र में उपलब्ध पानी अगले पखवाड़े तक ही चलने की उम्मीद है। इसके बाद स्थिति और गंभीर हो सकती है। सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध नहीं होने से इस बार रबी फसल लेना मुश्किल है।
दूसरी ओर, खेतों में उपलब्ध चारा भी सूखने लगा है। पानी और चारे की व्यवस्था नहीं होने से पशुपालकों की चिंता बढ़ गई है। सामान्य परिस्थितियों में जाम नदी में दिसंबर-जनवरी तक पानी रहता है, लेकिन इस बार अक्टूबर में ही नदी सूख जाने से पशुओं के लिए पानी की व्यवस्था करना बड़ी चुनौती बन गया है।