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धाम नदी के तट पर विराजे हैं चंद्रमौलेश्वर महादेव; महाशिवरात्रि पर उमड़ता है जनसैलाब, जानें इसका पौराणिक इतिहास
- Written By: प्रिया जैस
Chandramouleshwar Temple Wardha: वर्धा के पुराना मासोद में धाम नदी तट पर विराजे हैं चंद्रमौलेश्वर महादेव। जानें इस मंदिर का सुभेदार पांडे काल का इतिहास और महाशिवरात्रि का महत्व।

चन्द्रमौलेश्वर महादेव मंदिर (सौजन्य-सोशल मीडिया)
Purana Masod Mahadev: वर्धा जिले के कारंजा तहसील में आनेवाले पुराना मासोद स्थित चन्द्रमौलेश्वर महादेव मंदिर में महाविशरात्रि पर दर्शनार्थियों का तांता लगता है। धाम नदीतट पर बसा यह शिवालय असंख्य श्रध्दालुओं के आस्था का केंद्र है। खरांगणा-बांगडापुर मार्ग पर मासोद यह गांव बसा है। गांव के बुजुर्गों के अनुसार पहले यह गांव नए मासोद से दो किमी दूर धाम नदी तट पर बसा था।
महाकाली डैम में यह क्षेत्र आने से 1986 में नये मासोद का निर्माण किया गया। पुराने मासोद में पहले त्र्यंबकप्रसाद पांडे की सुभेदारी चलती थी। वें मुलता मध्यप्रदेश के होशंगाबाद के निवासी थे। पुराना मासोद सहित धावसा, लादगड, महाकाली, खरांगणा परिसर में उनकी बड़ी मात्रा में खेतीबाडी होने से वें यही पर स्थायी हो गए।
क्या है इस मंदिर की पौराणिक कहानी
कहते हैं कि, मासोद में त्र्यंबकप्रसाद पांडे की पुश्तैनी हवेली थी। वें शिवजी के परम भक्त थे। उनपर शिवजी की असीम कृपा थी। इसलिए उन्होंने धामनदी तट पर शिवालय के निर्माण का संकल्प किया। 1955 में उन्होंने चंद्रमौलेश्वर महादेव मंदिर की स्थापना की। इसके लिए उत्तरप्रदेश से कारागिरों को बुलाया गया था। पुराने पत्थरों के मदद से शिवालय का निर्माण किया गया।
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उक्त क्षेत्र में इस प्रकार का शिवायल नहीं है। यह शिवालय भाविकों का श्रध्दास्थान होने से यहां दूरदराज से दर्शन के लिए भक्त आते थे। सुभेदार पांडे ने मंदिर के नाम लादगड परिसर में एक खेत किया था। खेती की आय से मंदिर की देखरेख व पूजापाठ पर खर्च होता था।
परंतु गांव नदी की चपेट में आने से 1986 में गांव का स्थानांतरण हुआ। मंदिर दूर होने से इस ओर दुर्लक्ष होने लगा। परंतु कुछ शिवभक्तों ने मंदिर की रंगरंगोटी कर मरम्मत की। प्रतिवर्ष महाशिवरात्रि पर मंदिर में धार्मिक अनुष्ठान, महाप्रसाद का कार्यक्रम होता है। दूर दराज से यहां श्रध्दालु दर्शन के लिए पहुंचते है।
आज भी पाये जाते हैं प्राचीन अवशेष
मंदिर के आसपडोस के परिसर में कई ऐतिहासीक वास्तु है। फलस्वरुप आज भी परिसर में खोजने पर प्राचीन अवशेष के मिलने का दावा यहां के बुजुर्गों ने किया है। क्षेत्र के खैरवाडा में कुछ वर्ष पहले प्राचीन अवशेष पाये जाने की जानकारी है।
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मंदिर परिसर में भी प्राचीन बस्ती के अवशेष देखने मिल सकते है, ऐसा कहा जाता है। नए मासोद से पुराना मासोद की दूरी दो किमी की है। किन्तु यहां जाने के लिए पक्की सड़क भी नहीं है। ओबड़धाबड़ पगडंडी जैसे मार्ग से श्रध्दालु व किसान मंदिर परिसर में आते है। उक्त सड़क के निर्माण की मांग ग्रामीण कर रहे है।
विकसित हो सकता हैं पंछी अभयारण्य
उल्लेखनीय हैं कि, यह परिसर प्राकृतिक सुंदरता से भरापुरा है। धाम नदी यहां से गुजरती है। नदीतट से सटे करिब डेढ़ सौं एकड़ जमीन खाली पड़ी है। पानी बढ़ने पर जमीन डूबती, पश्चात पुन: खाली होती है। इस परिसर में विदेशी पंछी बड़ी संख्या में पहुंचते है।
नवंबर, दिसंबर माह में दुर्लभ विदेशी पंछियों के यहां दर्शन होते है। पश्चात जनवरी व फरवरी अंत तक पंछी यहां रहकर वापिस लौट जाते है। तालाब में मछलियां बड़ी मात्रा में है। बोटिंग की व्यवस्था हो सकती है। ढगा भूवन का जंगल होने से नदी तट पर वन्यजीव व पंछियों का मुक्त विचरण होता है। इस परिसर में उत्कृष्ट पशु-पंछी अभयारण्य विकसित हो सकता है।
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