ठाणे: उल्हासनगर में अवैध इमारतें होंगी वैध! सरकार ने शुरू की ‘वन विंडो स्कीम’, 1.20 लाख निर्माणों को बड़ी राहत
Ulhasnagar Illegal Buildings: ठाणे जिले के उल्हासनगर के 1.20 लाख अवैध निर्माणों को नियमित करने के लिए महाराष्ट्र सरकार ने 'वन विंडो सिस्टम' और रियायती ऑक्युपेंसी फीस का ऐलान किया है।
- Written By: सूर्यप्रकाश मिश्र | Edited By: आकाश मसने
मंत्री माधुरी मिसाल (सोर्स: सोशल मीडिया)
Madhuri Misal Speech In Assembly: कभी शरणार्थियों का स्थान कहे जाने वाले मुंबई महानगरीय क्षेत्र (MMR) के शहर उल्हासनगर में अवैध निर्माण एक बड़ी समस्या बन चुका है। पिछले दो ढाई दशक में उल्हासनगर में हुई अवैध इमारतों की भरमार से परेशान शहर वासियों के लिए राहत की खबर है। उल्हासनगर की अवैध इमारतों की वैधता के लिए जल्द कार्यवाही करने हेतु एकल खिड़की योजना शुरू की जाएगी।
मंगलवार को विधानसभा में इस विषय पर चर्चा के दौरान विधायक कुमार आयलानी एवं विधायक डॉ. किणीकर द्वारा उठाए गए सवाल पर नगरविकास राज्य मंत्री माधुरी मिसाल ने कहा कि उल्हासनगर के अवैध निर्माणों को वैध करने की प्रक्रिया को तेज करने के लिए मनपा, राजस्व विभाग एवं अन्य एजेंसियों के समन्वय से अब वन विंडो सिस्टम के जरिए समाधान किया जाएगा। बताया गया कि उल्हासनगर में हजारों इमारतों के साथ 1.20 लाख अवैध निर्माण हो गए हैं।
निर्णय पर नहीं हुआ अमल
वैसे महाराष्ट्र सरकार द्वारा उल्हासनगर की अवैध इमारतों को वैध करने का निर्णय काफी समय पहले भी लिया जा चुका है। परंतु दंड की अत्यधिक रकम एवं अन्य कारणों की वजह से प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी। उसके बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की कैबिनेट ने 10% ऑक्युपेंसी फीस के साथ उल्हासनगर की अवैध इमारतें को वैध करने का फैसला किया था।
सम्बंधित ख़बरें
वाडी में तथागत गौतम बुद्ध जयंती के मौके पर “वॉक फॉर पीस एंड नेशन” वॉक थाम को उत्तम प्रतिसाद
महावितरण ने भी मनाया राज्य स्थापना दिन : प्रतिभाशाली जन मित्रों और मशीन संचालकों को सम्मानित किया
मीरा रोड चाकूबाजी केस: नोट, नफरत और नेटवर्क- क्या सच में ‘लोन वुल्फ’ हमला?
भाईंदर: घोड़बंदर रोड पर राहत की तैयारी, अंतिम चरण में 5 पैदल यात्री पुल का निर्माण
कल्याण सांसद डॉ. श्रीकांत शिंदे के प्रयासों से लिए गए इस निर्णय से उल्हासनगर के लाखों निवासियों को राहत देने का मार्ग प्रशस्त हुआ। इस योजना से शहर के हजारों अनधिकृत इमारतों को अधिकृत किया जाना था। परन्तु कुछ शर्तों की वजह से प्रक्रिया लटक गई।
अवैध इमारतों की समस्या गंभीर रूप धारण कर रही
विधायक कुमार आयलानी ने विधानसभा में कहा कि उल्हासनगर में अवैध इमारतों की समस्या गंभीर रूप धारण कर रही है। उन्होंने कहा कि इसके लिए टाइम बाउंड कार्यक्रम चलाया जाए। विधायक डॉ. बालाजी किणीकर ने कहा कि मामूली दंड राशि लेकर शहर की अवैध इमारतों को वैध का दर्जा दिया जाना चाहिए। सैकडों इमारतें तो खतरनाक स्थिति में हैं। उनमें रहने वाले हजारों परिवारों के भविष्य का सवाल है।
मंत्री माधुरी मिसाल ने कहा कि रेडिरेकनर दरों का 10 प्रतिशत लेकर उन अवैध इमारतों को वैध किया जाएगा। पहले कलेक्टर को प्रक्रिया का अधिकार दिया गया था,परन्तु अब कमिश्नर को अधिकार दिया गया है। 1 जनवरी 2005 से पहले जिन अनधिकृत इमारतों में 4 एफएसआई से अधिक का उपयोग किया गया था, उन्हें नियमित करने का प्रस्ताव खारिज कर दिया गया था।
कैबिनेट बैठक में निर्णय लिया गया है कि ऑक्युपेंसी फीस में कमी की जाए और वार्षिक दर सूची के 10 फीसदी से शुल्क लेकर भूमि का नियमितीकरण किया जाए। साथ ही, यह भी निर्णय लिया गया है कि इस अधिभोग शुल्क का भुगतान करने के लिए ठाणे कलेक्टर के पास जाने की जरूरत नहीं है, बल्कि इसका अधिकार उल्हासनगर मनपा आयुक्त को दिया गया है।
यह भी पढ़ें:- Gudi Padwa 2026: मुंबई के गिरगांव में दिखेगी गणतंत्र दिवस की पुरस्कार विजेता महाराष्ट्र की झांकी
स्वतंत्रता के पहले बने कैम्प
स्वतंत्रता के पहले द्वितीय विश्व युद्ध के बाद शरणार्थियों के रहने की व्यवस्था यहां सैनिकों के शिविर स्थल पर की गई। भारत-पाक विभाजन के बाद बड़ी संख्या में सिंध से आए सिंधी समाज के लोगों की व्यवस्था यहां कैम्पों में की गई। यहां की जमीन केंद्र सरकार की है और भूखंड शरणार्थियों को दिए जाने थे, इसलिए ‘विस्थापित व्यक्ति मुआवजा और पुनर्विकास अधिनियम 1954’ अस्तित्व में आया।
इस साल शहर का नाम उल्हासनगर किए जाने के बाद इस अधिनियम के तहत भूखंडों का आवंटन किया गया। 13.4 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र के शहर की जनसंख्या फिलहाल लगभग 9 से 10 लाख हो गई है। जब शहर बसा और परिवार बढ़े, जगह की कमी होने लगी। धीरे-धीरे हर परिवार ने अपनी तरफ की ज़मीन पर कब्ज़ा कर लिया। इस गंभीर मामले को ध्यान में रखते हुए 2006 में ‘उल्हासनगर शहर में अनधिकृत विकास कार्यों का विनियमन’ अधिनियम अस्तित्व में आया। लेकिन प्रशासनिक नियमों में फंसकर वह प्रक्रिया भी अधूरी रह गई।
