

सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र SIR प्रक्रिया में अनियमितताओं की याचिका पर चुनाव आयोग से जवाब मांगा।
महाराष्ट्र SIR मामले में अगली सुनवाई 5 नवंबर को होगी।
भारत निर्वाचन आयोग और महाराष्ट्र राज्य निर्वाचन आयोग से जवाब मांगा।
केंद्र सरकार और महाराष्ट्र सरकार को भी नोटिस जारी किया है।
Supreme Court Notice To Election Commission: महाराष्ट्र में चल रहे SIR यानी मतदाता सूची के पुनरीक्षण अभियान को लेकर एक बड़ी खबर सामने आई है। मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर हुई कथित अनियमितताओं और लाखों लोगों के नाम कटने के आरोपों पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। शीर्ष अदालत ने इस मामले में संज्ञान लेते हुए चुनाव आयोग को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। मामले की अगली सुनवाई 5 नवंबर को तय की गई है।
सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया को चुनौती देने वाली एक याचिका पर भारत निर्वाचन आयोग, केंद्र सरकार, महाराष्ट्र राज्य निर्वाचन आयोग और महाराष्ट्र सरकार को नोटिस जारी किया है।
याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया है कि मतदाता रिकॉर्ड में गड़बड़ियां हैं। जिनमें 1.2 करोड़ मतदाताओं से जुड़ी विसंगतियां और पुणे तथा कुछ अन्य इलाकों में 40.6% मतदाताओं के नाम हटाए जाना शामिल है। उन्होंने मांग की है कि अगर नवंबर तक मतदाता सूची को अंतिम रूप नहीं दिया जाता है, तो चुनाव रोक दिए जाएं।
यह मामला चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ के सामने आया। याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट को बताया कि 6 नवंबर को अंतिम मतदाता सूची का प्रकाशन होना है। ऐसे में अंतिम सूची जारी होने से पहले ही इस मामले पर तुरंत रोक लगाने या निर्णय लेने की जरूरत है।
याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया है कि ड्राफ्ट मतदाता सूची में गड़बड़ियां हैं, जिनमें 1.2 करोड़ मतदाताओं से जुड़ी विसंगतियां और पुणे तथा कुछ अन्य इलाकों में 40.6% मतदाताओं के नाम हटाए जाना शामिल है। उन्होंने मांग की है कि अगर नवंबर तक मतदाता सूची को अंतिम रूप नहीं दिया जाता है, तो चुनाव रोक दिए जाएं।
याचिकाकर्ता अरुण आनंदगिरी की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद पी. दातार ने अदालत में दलील रखी कि महाराष्ट्र के कुल 9 करोड़ पंजीकृत मतदाताओं में से लगभग 3 करोड़ मतदाताओं के नाम ड्राफ्ट रोल जारी होने के बाद हटा दिए गए हैं।
याचिकाकर्ता ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा कि आयोग इन हटाए गए मतदाताओं से दोबारा पंजीकरण के लिए 'फॉर्म 6' भरने को कह रहा है। वरिष्ठ वकील ने स्पष्ट किया कि 'फॉर्म 6' सिर्फ पहली बार मतदान करने वाले लोगों के लिए होता है। जो नागरिक वर्षों से मतदान कर रहे हैं, उनसे दोबारा यह फॉर्म नहीं भरवाया जाना चाहिए।
दातार ने मुंबई और पुणे का उदाहरण देते हुए सुप्रीम कोर्ट को बताया कि इन दोनों शहरों में लगभग 3,500 पुनर्विकास प्रोजेक्ट चल रहे हैं। इसके कारण पुरानी हाउसिंग कॉलोनियों को तोड़ा जा रहा है और हजारों परिवारों को अस्थायी रूप से दूसरी जगहों पर शिफ्ट होना पड़ा है। पते में बदलाव और भौतिक सत्यापन न हो पाने की वजह से ऐसे आम नागरिकों के नाम मतदाता सूची से काटे गए हैं, जो कि गलत है।
याचिकाकर्ता ने मांग की कि जब तक सुप्रीम कोर्ट इस पूरे मामले की सुनवाई पूरी न कर ले, तब तक मतदाता सूची को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया पर रोक लगाई जाए। हालांकि, अदालत ने तुरंत समय-सीमा बढ़ाने से इनकार कर दिया, लेकिन याचिकाकर्ता को आश्वस्त किया कि कोर्ट इस मुद्दे को गंभीरता से ले रहा है।
CJI सूर्यकांत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि चिंता न करें, आप एक व्हिसलब्लोअर के रूप में हमारे पास आए हैं। यदि हमें लगता है कि ऐसे कई जायज लोग हैं जिन्होंने अभी तक अपने दस्तावेज जमा नहीं किए हैं, तो हम निश्चित रूप से समय सीमा बढ़ाएंगे। हमने पहले भी SIR से जुड़े मामलों में तारीखें बढ़ाई हैं।