Shirur APMC Election में बड़ा सियासी उलटफेर, भाजपा ने आखिरी वक्त में अजित पवार गुट से मिलाया हाथ

Shirur APMC Election: शिरूर कृषि उत्पन्न बाजार समिति चुनाव में नामांकन वापसी के अंतिम दिन बड़ा राजनीतिक बदलाव देखने को मिला। भाजपा ने अजित पवार गुट के साथ गठबंधन कर नया पैनल घोषित किया।
Shirur APMC Election News
शिरूर कृषि उत्पन्न बाजार समिति (सौ. सोशल मीडिया )
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Shirur APMC Election News: शिरूर कृषि उत्पन्न बाजार समिति (एपीएमसी) में नामांकन वापसी के आखिरी दिन भारी सियासी उलटफेर देखने को मिला। यहां लंबे समय से चल रही राजनीतिक चर्चाओं पर तब विराम लगा, जब भाजपा कार्यकर्ताओं ने शरद पवार के 'तुतारी' गुट को बड़ा झटका दे दिया।

भाजपा ने ऐन वक्त पर पासा पलटते हुए सीधे अजीत पवार के 'घड़ी' गुट से हाथ मिला लिया। इस अचानक हुए गठबंधन से शिरूर का सियासी पारा चढ़ गया है। इसी उठापटक के बीच, पूर्व सभापति शंकर जांभलकर ने अपना नामांकन वापस ले लिया है जो अब दोनों ही गुटों के लिए बड़ा सिरदर्द साबित होगा।

नामांकन वापस लेने के कुछ समय पहले तक भाजपा नेता, अशोक पवार गुट के साथ चर्चा कर रहे थे और माना जा रहा था कि दोनों मिलकर पैनल फाइनल करेंगे। लेकिन आखिरी पलों में पासा पलट गया। भाजपा कार्यकर्ताओं ने अशोक पवार गुट को चकमा देकर वर्तमान विधायक माउली कटके और भाजपा जिलाध्यक्ष प्रदीप कंद के साथ मिलकर एक नया पैनल घोषित कर दिया।

तुतारी गुट को लगा जोरदार झटका

इस अचानक हुए गठबंधन से 'तुतारी' गुट को गहरा धक्का लगा है और चुनाव का पूरा समीकरण ही बदल गया है। इस सियासी उठापटक में पूर्व सभापति शंकर जांभलकर का नाम वापस लेना सबसे बड़ी चर्चा का विषय बना हुआ है।

अपने कार्यकाल में बेहतरीन विकास कार्य करने की वजह से वे कार्यकर्ताओं की पहली पसंद थे लेकिन ऐन वक्त पर नए गठबंधन के कारण पैनल बिखरने से उन्होंने चुनाव से पीछे हटने का फैसला किया, जो महायुति के लिए भारी नुकसानदेह साबित हो सकता है। नए समीकरणों से अजित पवार गुट में असंतोष फैल गया है।

MIDC क्षेत्र को प्राथमिकता और ग्रामीण असंतोष

घोषित किए गए नए पैनल में एमआईडीसी क्षेत्र के 8 उम्मीदवारों को मौका दिया गया है जिससे शिरूर तहसील के ग्रामीण इलाकों में तीव्र आक्रोश है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस क्षेत्रीय असंतुलन और ग्रामीण अनदेखी का सीधा नुकसान राष्ट्रवादी कांग्रेस और भाजपा महायुति के उम्मीदवारों को उठाना पड़ सकता है। दिग्गजों की बगावत और ग्रामीण वोटर्स की यह नाराजगी चुनाव के नतीजों को पूरी तरह बदल सकती है।

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