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अंग्रेज जिन्हें कहते थे भारतीय अशांति का जनक: लोकमान्य तिलक के वे 5 फैसले, जिसने हिला दी थी ब्रिटिश हुकूमत

Bal Gangadhar Tilak Jayanti Special: लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की जयंती पर जानिए कैसे 'केसरी' अखबार, गणेश उत्सव और 'स्वराज' के नारे ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का रुख हमेशा के लिए बदल दिया।

  • Written By: आकाश मसने
Updated On: Jul 23, 2026 | 05:35 AM

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक (सोर्स: सोशल मीडिया)

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Lokmanya Bal Gangadhar Tilak 5 Decisions: 23 जुलाई 1856 को महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले में जब एक बालक का जन्म हुआ, तब किसी ने नहीं सोचा था कि यही बालक आगे चलकर ब्रिटिश साम्राज्य की नीव हिला देगा। नाम रखा गया था केशव गंगाधर तिलक, जिन्हें दुनिया बाद में ‘लोकमान्य’ के नाम से पूजने लगी। लोकमान्य का अर्थ होता है- जिसे जनता ने अपना नेता स्वीकार कर लिया हो।

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में बाल गंगाधर तिलक का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। वे न सिर्फ एक स्वतंत्रता सेनानी थे, बल्कि कुशल पत्रकार, बैरिस्टर, गणितज्ञ और महान समाज सुधारक भी थे। आइए जानते है बाल गंगाधर तिलक की जयंती के अवसर पर उनके वो फैसले जिसने अंग्रेजी हुकूमत की नीव हिला कर रख दी।

देश की आजादी में कई लोगों का योगदान रहा है। हालांकि, कुछ ऐसे भी थे जिन्होंने आजादी की चिंगारी को जन-जन तक पहुंचाया और लोगों के दिलों में उम्मीद जगाई कि वे भी आजाद भारत का सपना देख सकते हैं। उन्हीं में से एक लोकमान्य बालगंगाधर तिलक भी हैं। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक का नाम अत्यंत सम्मान और गौरव के साथ लिया जाता है।

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शिक्षा से समाजसेवा तक का सफर

पुणे के प्रसिद्ध दक्कन कॉलेज से गणित में स्नातक करने के बाद तिलक ने बॉम्बे यूनिवर्सिटी से कानून (LL.B.) की पढ़ाई पूरी की। उनके पास एक आरामदायक वकील या सरकारी अफसर की जिंदगी जीने का विकल्प खुला था, लेकिन उन्होंने देश सेवा को चुना। वे मानते थे कि बिना शिक्षित और जागरूक समाज के आजादी हासिल नहीं की जा सकती।

पत्रकारिता को बनाया स्वतंत्रता की ढाल

जन-जन तक अपनी बात पहुंचाने और अंग्रेजी हुकूमत की दमनकारी नीतियों को बेनकाब करने के लिए तिलक ने दो अखबार शुरू किए। केसरी आम जनता को जागृत करने के लिए मराठी भाषा में ‘केसरी’ और शिक्षित वर्ग और अंग्रेजी सरकार तक जनता की बात पहुंचाने के लिए अंग्रेजी में ‘द मराठा’। इन अखबारों के तीखे लेखों ने भारतीयों के दिलों में सोई हुई देशभक्ति को जगा दिया।

जब 1896-97 में महाराष्ट्र प्लेग की चपेट में था और अंग्रेज अधिकारी राहत के नाम पर जनता पर अत्याचार कर रहे थे, तब तिलक के अखबारों ने सरकार के खिलाफ पुरजोर आवाज उठाई। इसके लिए उन्हें 18 महीने जेल में भी रहना पड़ा।

गणेश उत्सव और शिवाजी महाराज जयंती: सांस्कृतिक चेतना से स्वतंत्रता संग्राम

अंग्रेज सरकार ने भारतीयों के एक जगह इकट्ठा होने या राजनीतिक सभाएं करने पर कड़े प्रतिबंध लगा रखे थे। तिलक ने इसका तोड़ निकाला। उन्होंने गणपति उत्सव और शिवाजी उत्सव को घर-घर की पूजा से निकालकर सार्वजनिक मंच प्रदान किया।

इन सांस्कृतिक और धार्मिक आयोजनों के बहाने लोग एकत्र होने लगे, जहां आजादी की रणनीतियां बनती थीं और युवाओं में राष्ट्रवाद का बीजारोपण होता था। आज महाराष्ट्र और देश भर में जो सार्वजनिक गणेशोत्सव धूमधाम से मनाया जाता है, उसकी नींव लोकमान्य तिलक ने ही रखी थी।

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने शुरू किया था सार्वजनिक गणेशोत्सव (सोर्स: सोशल मीडिया)

मंडले जेल की यातनाएं और ‘गीता रहस्य’ का जन्म

1908 में जब क्रांतिकारी खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चंद्र चाकी ने अंग्रेजों पर बम फेंका, तो बाल गंगाधर तिलक ने अपने समाचार पत्र ‘केसरी’ में उनका पक्ष लेते हुए अंग्रेजी नीतियों की कड़ी आलोचना की। नतीजतन, उन पर राजद्रोह का केस चला और उन्हें बर्मा (अब म्यांमार) की खूंखार मंडले जेल में 6 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई।

जेल की कठिन परिस्थितियों में भी लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक का हौसला नहीं टूटा। वहां उन्होंने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘गीता रहस्य’ की रचना की। इस पुस्तक के जरिए उन्होंने भगवद्गीता के निष्काम ‘कर्मयोग’ की व्याख्या की और बताया कि राष्ट्रसेवा ही सबसे बड़ा धर्म है।

‘लाल-बाल-पाल’ के आक्रामक राष्ट्रवाद से कांपती थी अंग्रेज हुकूमत

स्वतंत्रता आंदोलन को आक्रामक रुख देने के लिए लाल-बाल-पाल की तिकड़ी काफी मशहूर हुई। इसमें लाल यानी लाला लाजपत राय, बाल यानी बाल गंगाधर तिलक और पाल यानी बिपिन चंद्र पाल थे। इन नेताओं ने नरमपंथी नीति के बजाय बहिष्कार और स्वदेशी का रास्ता अपनाया।

बाल गंगाधर तिलक के इस आक्रामक राष्ट्रवाद से अंग्रेज इतने डरते थे कि ब्रिटिश पत्रकार वैलेंटाइन शिरोल ने उन्हें ‘भारतीय अशांति का जनक’ (Father of Indian Unrest) की उपाधि दे डाली थी। वहीं, महात्मा गांधी ने उन्हें ‘आधुनिक भारत का निर्माता’ कहा था।

यह भी पढ़ें:- तीसरी मुंबई, मेट्रो से समृद्धि महामार्ग तक, देवेंद्र फडणवीस के वो फैसले जिसने बदली महाराष्ट्र की तस्वीर

स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है… जैसा नारा

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने न केवल अंग्रेजी शासन के विरुद्ध जनमत तैयार किया बल्कि भारतीयों के मन में स्वतंत्रता की ऐसी लौ जलाई जिसने पूरे देश को एक सूत्र में बांध दिया। उनका प्रसिद्ध नारा ‘स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा’, आज भी देशभक्ति और आत्मसम्मान का प्रतीक माना जाता है।

1 अगस्त 1920 को लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक का निधन हो गया। उनका संपूर्ण जीवन राष्ट्रसेवा, त्याग और संघर्ष का एक प्रेरणादायक उदाहरण है। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में उनके योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता। आज भी उनका जीवन हमें साहस, आत्मविश्वास और देशभक्ति की प्रेरणा देता है।

Lokmanya bal gangadhar tilak jayanti special 5 key decisions that shook british empire

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Published On: Jul 23, 2026 | 05:35 AM

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