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आरटीई प्रवेश प्रक्रिया बनी बोझ, नियमों में बदलाव से अभिभावक परेशान, मुफ्त शिक्षा पर सवाल

RTE Admission Process में हालिया बदलावों ने अभिभावकों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। दूरी सीमा में बदलाव और ऑनलाइन प्रक्रिया के कारण ग्रामीण परिवारों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ रहा है।

  • Written By: अपूर्वा नायक
Updated On: Mar 22, 2026 | 01:21 PM

शिक्षा का अधिकार (सौ. सोशल मीडिया )

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Right To Edducation Admission Process Issues: एक तरफ सरकार वंचितों को मुफ्त शिक्षा देने का दावा कर रही है, वहीं दूसरी ओर प्रवेश की जटिल और महंगी प्रक्रिया ने ‘मुफ्त शिक्षा’ की संकल्पना को कागजों तक सीमित कर दिया है।

शिक्षा का अधिकार (आरटीई) अधिनियम के तहत होने वाली प्रवेश प्रक्रिया में राज्य सरकार द्वारा हाल ही में किए गए संशोधनों ने अभिभावकों, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों के परिवारों के सामने नई मुश्किलें खड़ी कर दी हैं। शुरुआती चरण में सरकार ने स्कूल चयन के लिए केवल 1 किलोमीटर के दायरे की कड़ी शर्त रखी थी, जिसका व्यापक स्तर पर विरोध हुआ।

जन-आक्रोश को देखते हुए सरकार ने अब इस दूरी की सीमा को बढ़ाकर 5 किलोमीटर और उससे अधिक कर दिया है। हालांकि, सरकार के इस तकनीकी सुधार ने अभिभावकों के लिए एक नई वित्तीय और मानसिक चुनौती पैदा कर दी है।

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ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं और इंटरनेट की कमी के कारण अभिभावकों को पूरी तरह साइबर कैफे पर निर्भर रहना पड़ रहा है, जिससे उनका समय और पैसा दोनों बर्बाद हो रहे हैं।

ग्रामीण इलाके में कोई बेहतर स्कूल नहीं

ग्रामीण क्षेत्रों की भौगोलिक चुनौतियां इस समस्या को और अधिक गंभीर बना देती हैं। जमीनी हकीकत यह है कि अधिकांश मान्यता प्राप्त और उच्च गुणवत्ता वाले निजी स्कूल शहरी केंद्रों या विकसित इलाकों में स्थित है।

गांवों में 1 किलोमीटर के दायरे में निजी स्कूलों का अभाव होने के कारण कई पात्र और जरूरतमंद बच्चे इस योजना के लाभ से वंचित हो रहे थे। पहले लागू की गई 1 किलोमीटर की सख्त सीमा ने उन परिवारों के लिए अवसर लगभग बंद कर दिए थे, जो वास्तव में इस आरक्षण के हकदार हैं। अब दूरी की सीमा बढ़ाए जाने के फैसले का सैद्धांतिक रूप से तो स्वागत हो रहा है, लेकिन प्रक्रिया को दोबारा दोहराने की विवशता ने अभिभावकों का मानसिक संताप बढ़ा दिया है।

फॉर्म अपडेट करने के लिए फिर से भरना पड़ रहा शुल्क

  • नियमों में आए इस अचानक बदलाव के कारण हजारों अभिभावकों को अपने पहले से भरे हुए आवेदन पत्रों में त्रुटि सुधार करना पड़ रहा है।
    नवलाख उंब्रे जैसे ग्रामीण अंचलों के साइबर कैफे में इन दिनों आवेदकों की भारी भीड़ देखी जा रही है।
  • सबसे बड़ी विडंबना यह है कि पोर्टल पर फॉर्म में सुधार करने के लिए साइबर कैफे संचालक अभिभावकों से दोबारा शुल्क वसूल रहे हैं। कैफे संचालकों का तर्क है कि सरकारी पोर्टल की धीमी गति और फॉर्म में बार-बार संशोधन करने में अत्यधिक समय और मेहनत लगती है, जिसके एवज में वे अपना सेवा शुल्क ले रहे हैं।
  • एक ओर जहां आरटीई का मूल उद्देश्य वंचित और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण मुफ्त शिक्षा प्रदान करना है, तो वहीं दूसरी ओर प्रवेश की यह जटिल और खर्चीली प्रक्रिया ग्रामीण इलाकों के गरीब परिवारों की जेब पर भारी पड़ रही है।
  • स्थानीय नागरिकों का स्पष्ट कहना है कि यदि प्रवेश प्रक्रिया ही इतनी महंगी होगी, तो मुफ्त शिक्षा की संकल्पना केवल कागजों तक ही सीमित रह जाएगी।

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नीतिगत फैसलों में प्रशासनिक अदूरदर्शिता

शैक्षणिक वर्ष 2026-27 के लिए ऑनलाइन प्रवेश प्रक्रिया में आए इन निरंतर उतार-चढ़ावों ने शिक्षा विभाग की नीतिगत स्थिरता पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पिछले साल तक जहां 3 किमी तक की रियायत दी जा रही थी, उसे इस साल घटाकर 1 किमी कर दिया गया और फिर कड़े विरोध के बाद बढ़ाकर 5 किमी किया गया। नीतिगत फैसलों में इस तरह की अस्थिरता प्रशासनिक अदूरदर्शिता को दर्शाती है।

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Published On: Mar 22, 2026 | 01:21 PM

Topics:  

  • Maharashtra
  • Pune News
  • Right to Education

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