रोहित तिलक (सोर्स: साेशल मीडिया)
Rohit Tilak Joins Shiv Sena: महाराष्ट्र में कांग्रेस को एक बार फिर बड़ा लगा है। लोकमान्य तिलक के प्रपौत्र रोहित तिलक के कांग्रेस का हाथ छोड़ मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में शामिल होने के फैसले ने स्थानीय राजनीति में खलबली मचा दी है। इस फैसले ने महाराष्ट्र की सत्ता के गलियारों में पुणे का कसबा विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र एक बार फिर सबसे हॉट सीट बना दिया है। रोहित तिलक के इस कदम ने न केवल कांग्रेस को झटका दिया है, बल्कि शिवसेना (शिंदे) के भीतर भी वर्चस्व की नई जंग छेड़ दी है।
इस राजनीतिक बदलाव का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि रोहित तिलक और पुणे के कद्दावर नेता रवींद्र धंगेकर अब एक ही खेमे में होंगे। साल 2014 के विधानसभा चुनाव में ये दोनों नेता एक-दूसरे के खिलाफ चुनावी मैदान में थे। उस वक्त भाजपा के गिरीश बापट ने जीत दर्ज की थी, जबकि तिलक को 31 हजार और धंगेकर को 26 हजार वोट मिले थे। अब जब ये दोनों चेहरे शिंदे गुट के बैनर तले एक साथ आएंगे, तो सवाल यह उठता है कि क्या धंगेकर का एकल वर्चस्व बरकरार रह पाएगा?
रोहित तिलक के कांग्रेस छोड़ने की नींव काफी समय पहले ही पड़ गई थी। विवाद तब गहराया जब पुणे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘लोकमान्य तिलक पुरस्कार’ से सम्मानित करने की बात आई। कांग्रेस ने इसका विरोध किया था, लेकिन तिलक परिवार इस सम्मान के पक्ष में था। इसी वैचारिक मतभेद ने तिलक को कांग्रेस से दूर कर दिया और आखिरकार उन्होंने भगवा चोला ओढ़ लिया।
रवींद्र धंगेकर के लिए पिछला कुछ समय काफी संघर्षपूर्ण रहा है। लोकसभा और विधानसभा चुनावों में मिली हार के बाद उन्होंने कांग्रेस का साथ छोड़कर शिंदे गुट का दामन थामा था। हालांकि, निकाय चुनावों में भी उन्हें वह सफलता नहीं मिली जिसकी उम्मीद थी। अब पार्टी के भीतर रोहित तिलक जैसे मजबूत चेहरे की एंट्री ने धंगेकर की राह और मुश्किल कर दी है।
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कसबा पेठ हमेशा से ही पुणे की राजनीति का केंद्र रहा है। रोहित तिलक की स्वच्छ छवि और तिलक विरासत का समर्थन, शिंदे गुट को पुणे में मजबूती दे सकता है। लेकिन पार्टी के भीतर दो बड़े शक्ति केंद्रों (तिलक और धंगेकर) के बीच सामंजस्य बिठाना मुख्यमंत्री शिंदे के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं होगा। आने वाले चुनावों में यह देखना दिलचस्प होगा कि शिंदे गुट टिकट वितरण में किसे प्राथमिकता देता है।