Purandar Airport भूमि अधिग्रहण, किसानों ने DA की बैठक का सर्वसम्मति से बहिष्कार किया
Pune: पुरंदर एयरपोर्ट भूमि अधिग्रहण को लेकर किसानों ने जिलाधिकारी की बैठक का बहिष्कार किया। मुआवजे में प्रति एकड़ 7–8 करोड़ की मांग, अधिग्रहण रिपोर्ट न देने व दबाव बनाने के आरोप तूल पकड़े।
- Written By: अपूर्वा नायक
पुरंदर इंटरनेशनल एयरपोर्ट प्रोजेक्ट (सौ. सोशल मीडिया )
Pune News In Hindi: पुरंदर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के लिए भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया के बीच, परियोजना प्रभावित किसानों ने सोमवार (8 दिसंबर को होने वाली) को जिलाधिकारी जितेंद्र डूडी द्वारा बुलाई गई महत्वपूर्ण बैठक में शामिल न होने का सर्वसम्मत प्रस्ताव पारित किया है।
किसानों का आरोप है कि सरकार उन पर बातचीत का दबाव बना रही है और भूमि अधिग्रहण से संबंधित समय-समय पर कामकाज की रिपोर्ट उपलब्ध नहीं करा रही है।
जिलाधिकारी की बैठक से किसानों की दूरी
पुरंदर तालुका के सात गांवों (वनपुरी, उदाचीवाडी, कुंभारवलण, एखतपूर, मुंजवडी, खानवडी और पारगांव) के किसानों ने शनिवार, 6 दिसंबर को एक बैठक की, जिसमें सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया गया कि वे सरकार द्वारा बुलाई गई किसी भी बैठक में उपस्थित नहीं होंगे।
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जिलाधिकारी कार्यालय में प्रस्तावित आज की बैठक में भूमि अधिग्रहण के मुआवजे की घोषणा होने की संभावना थी, जिसके लिए सोशल मीडिया के माध्यम से प्रत्येक वाडी-बस्ती से दो-दो प्रतिनिधियों को उपस्थित रहने की सूचना दी गई थी।
प्रति एकड़ 7 से 8 करोड़ रुपये की मांग
- स्थानीय किसान सैद्धांतिक रूप से इस परियोजना के विरोध में हैं, लेकिन सरकार ने जमीन माप की प्रक्रिया पूरी कर ली है और अब मुआवजे की घोषणा की तैयारी है,
कुछ दिन पहले जिलाधिकारी जितेंद्र डूडी ने किसान प्रतिनिधियों से मुलाकात की थी। इस बैठक में अधिकांश किसानों ने जमीन के बदले प्रति एकड़ 7 से 8 करोड़ रुपये तक की मांग रखी थी। - किसानों ने पूर्व केंद्रीय कृषि मन्त्री शरद पवार और सांसद सुप्रिया सुले के सामने भी ये मांग उठाई थीं। इसके अलावा, किसानों की मुख्य मागों में अब तक पूरी की गई भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया की लिखित रिपोर्ट पेश करना, बेघरों को मुआवजा और सरकारी नौकरी शामिल हैं।
रिपोर्ट न मिलने से बढ़ा गतिरोध
- किसानों का आरोप है कि अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू होने के बावजूद, सरकार ने उनकी मांग पर कोई स्पष्ट भूमिका नहीं अपनाई और न ही उन्हें अब तक कोई लिखित रिपोर्ट दी गई, कितने किसानों ने प्रत्यक्ष सहमति दी और जमीन की माप के बाद बचे हुए क्षेत्र पर से भूमि अधिग्रहण के स्टाम्प क्यों नहीं हटाए गए।
- सरकार की तरफ से रिपोर्ट न मिलने और दबाव बनाने की रणनीति अपनाने के आरोपों के चलते। किसानों ने जिलाधिकारी की बैठक का बहिष्कार कर अपने विरोध को और अधिक मुखार कर दिया है।
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- दबाव बनाकर निर्णय लिए जाते हैं
किसानों का स्पष्ट कहना है कि एक या दो प्रतिनिधि पूरे गांव का निर्णय नहीं ले सकते। इसलिए, सरकार को किसानों के साथ कोई भी चर्चा या बातचीत गांव स्तर पर आकर करनी चाहिए, उनका तर्क है कि जिलाधिकारी कार्यालय में उन्हें बोलने नहीं दिया जाता और दबाव बनाकर सरकार के अनुकूल निर्णय लिए जाते हैं।
