पीओपी की मूर्तियों
पुणे. गणेशोत्सव की शुरुआत 7 सितंबर से हो रही है। ये उत्सव 17 सितंबर तक रहेगा। उत्सव को लेकर लोगों में भारी उत्साह है। त्योहार की तैयारियां सार्वजनिक मंडलों के साथ-साथ घर-घर में भी चल रही हैं। हालांकि पीओपी मूर्तियों को लेकर लोगों में असमंजस बना हुआ है। पाबंदी के बावजूद पीओपी की मूर्तियां बाजार में उपलब्ध है। हालही में बॉम्बे हाईकोर्ट ने मनपा को सार्वजनिक मंडपों में पीओपी की मूर्तियां स्थापित न करने के निर्देश दिए है। लेकिन मंडलों द्वारा इस बात को लेकर असमंजस है कि पीओपी को लेकर जारी नियम मुंबई में या पुणे में भी लागू है। मंडलों द्वारा पहले से ही मूर्तियों की बुकिंग कर ली गयी है। कई जगह लोग अब भी पीओपी मूर्तियों की तरफ आकर्षित हो रहे है। पुणेकरों का कहना है कि पीओपी मूर्तियों पर पाबंदी को लेकर हम असमंजस की स्थिति में है। हमें अब तक यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि यह नियम मुंबई या पुणे में भी लागू है। इसे लेकर लोगों में भ्रम पैदा हो गया है।
दरअसल प्लास्टर ऑफ पेरिस (पीओपी) गणेश की मूर्तियों पर प्रतिबंध नहीं लगाया गया है। लेकिन, बॉम्बे हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश देवेन्द्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस अमित बोरकर की पीठ ने निर्देश दिया है कि सार्वजनिक मंडपों में पीओपी की मूर्तियां स्थापित नहीं की जानी चाहिए, साथ ही कोर्ट ने प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के दिशानिर्देशों का पालन करने के भी निर्देश दिए हैं।
पीओपी मूर्तियों पर प्रतिबंध नहीं है। लेकिन, सार्वजनिक मंडप में इन्हें स्थापित नहीं करने की घोषणा होने से नागरिक असमंजस में हैं। 2020 में पीओपी की मूर्तियों पर पर प्रतिबंध लगाने का आदेश दिया गया था। हालांकि, इसे अभी भी लागू नहीं किया जा रहा है। इस पर कोर्ट ने नाराजगी भी जताई है। हर साल राज्य सरकार भी पीओपी गणेश मूर्तियों पर प्रतिबंध लगाने का रुख अपनायी है, लेकिन वास्तव में इसे लागू नहीं किया गया है। हाईकोर्ट ने पर्यावरण संरक्षण के लिहाज से प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा ‘पीओपी’ को लेकर बनाए गए नियमों का सख्ती से पालन करने के निर्देश दिए हैं, साथ ही कोर्ट ने मनपा को भी निर्देश दिया है कि गणेश मंडल को अनुमति देते समय पीओपी पर प्रतिबंध की शर्त लगाना जरूरी है।
जीवित नदी संस्था ने कहा कि मंडलों की तुलना घरों में पीओपी की मूर्तियां अधिक होती हैं। घर में बनी प्लास्टर ऑफ पेरिस की गणेश प्रतिमाओं को तालाबों, कुओं और नदी, नालों में विसर्जन किया जाता है। ये मूर्तियां विघटित नहीं होती इसलिए, इन्हें कई महीनों तक पानी पर तैरते हुए देखा जा सकता है। यह मछली और अन्य जलीय जीवन, जानवरों और पक्षियों पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालता है। इससे बचने के लिए मिट्टी से बनी गणेश प्रतिमाएं बनवाएं। इस तरह की मूर्तियों को होद में ही विसर्जन करें।
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तुलसीबाग गणेश मंडल के नितिन पंडित ने कहा, “पीओपी का काम 90 प्रतिशत तक बंद हो गया है। पुणे में मंडल की मूर्तियां स्थायी हैं। इससे नदी में प्रदूषण नहीं होती। पूजा के लिए शाडू मिट्टी की मूर्तियों का उपयोग किया जाता है। कसबा और जोगेश्वरी की मूर्तियां शाडू की मिट्टी से बनाई जाती है। पीओपी की मूर्तियां ज्यादातर घरेलू के लिए उपयोग किया जाता है। पीओपी का उपयोग सार्वजनिक मंडलियों में नहीं किया जाता है। मुंबई में दिक्कत है। बड़ी-बड़ी मूर्तियां हैं। इससे समुद्र में विसर्जन किया जाता है। कई जगह इसे होद में विसर्जन किया जाता है। लेकिन, हमारे यहां ऐसा नहीं होता है।”
कागज की लुगदी से मूर्ति बनाने वाले संतोष राउत ने कहा, “पिछले तीन वर्षों से हम अखबार की लुगदी से मूर्तियां बना रहे हैं। लेकिन, नागरिकों द्वारा इसकी मांग नहीं की जाती है। लोगों को पीओपी की मूर्तियां ज्यादा पसंद आते है। हालांकि लुगदी से बनी मूर्तियां पर्यावरण के अनुकूल होती हैं। पर्यावरण के लिए यह एक बेहतरीन विकल्प है।”
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महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण अधिकारी जय शंकर सालुंखे ने कहा, “केंद्रीय बोर्ड ने निर्देश दिया है कि सार्वजनिक मंडपों में पीओपी की मूर्ति स्थापित नहीं की जाए। इस बारे में हमें अभी तक कोई जानकारी नहीं मिली है। इस बात का भी कोई आदेश नहीं है कि हमें स्थानीय स्तर पर जांच करनी चाहिए या नहीं।”