Pune Water Crisis: फ्लैट खरीदारों को टैंकर पर छोड़ने वाले बिल्डरों पर सख्ती की मांग, PMC में छिड़ा बवाल
Pune Water Crisis Builders Affidavit Issue: पुणे महानगर पालिका की जीबी बैठक में जल संकट और बिल्डरों की वादाखिलाफी का मुद्दा छाया रहा। प्रशासन ने अब बिल्डरों के शपथपत्र सार्वजनिक करने की घोषणा की है।
- Written By: अपूर्वा नायक
पुणे में जल संकट (सौ. सोशल मीडिया )
Pune Water Crisis Builders Affidavit PMC: पुणे महानगर पालिका की आम सभा यानी जनरल बॉडी (जीबी) की शुक्रवार को हुई बैठक में शहर का गहराता जल संकट और बिल्डरों द्वारा फ्लैट खरीदारों के साथ की जा रही वादाखिलाफी का मुद्दा छाया रहा।
चर्चा का मुख्य केंद्र वे ‘शपथपत्र’ (एफिडेविट) रहे, जिन्हें बिल्डर निर्माण कार्य की मंजूरी के समय जमा करते हैं। इन शपथपत्रों में वादा किया जाता है कि जब तक मनपा की पाइपलाइन संबंधित क्षेत्र तक नहीं पहुंचती, तब तक पानी की आपूर्ति की जिम्मेदारी बिल्डर की होगी।
नगरसेवकों ने आरोप लगाया कि प्रोजेक्ट को मंजूरी मिलते ही बिल्डर इन वादों को ठंडे बस्ते में डाल देते हैं और कब्जा (पजेशन) देने के बाद नागरिकों को महंगे टैंकरों के भरोसे छोड़ दिया जाता है। इस विषय पर सदन में भारी हंगामा हुआ और प्रशासन से बिल्डरों की मनमानी पर लगाम लगाने की मांग की गई।
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अब तक कितने बिल्डरों पर हुई कार्रवाई ?
नगरसेवक सचिन दोडके ने आक्रामक रुख अपनाते हुए प्रशासन से जवाब मांगा कि शपथपत्रों के उल्लंघन पर अब तक कितने बिल्डरों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की गई है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या ये शपथपत्र सिर्फ कागजी औपचारिकता बनकर रह गए हैं?
वास्तविकता में फ्लैट मिलने के बाद बिल्डर जिम्मेदारी से हाथ झाड़ लेते हैं और पानी का भारी आर्थिक बोझ आम जनता पर आ पड़ता है। दोडके ने मांग की कि जिन परियोजनाओं में बिल्डरों ने वादे तोड़े हैं, वहां पानी के टैंकरों का पूरा खर्च उन्हीं बिल्डरों से वसूला जाना चाहिए।
प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी उठे सवाल
कांग्रेस के वरिष्ठ नगरसेवक अरविंद शिंदे ने प्रशासन को कठघरे में खड़ा करते हुए पूछा कि जिन क्षेत्रों में पानी की बुनियादी व्यवस्था ही नहीं है, वहां बिल्डरों को ‘ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट‘ (ओसी) कैसे जारी कर दिया जाता है? शिंदे ने कहा कि नागरिक अपनी जीवनभर की पूंजी लगाकर फ्लैट खरीदते हैं, लेकिन अंत में उन्हें केवल आश्वासन ही मिलता है। वहीं, सभागृह नेता गणेश बिडकर ने लोहगांव, वाघोली और बाणेर जैसे नव-सम्मिलित 34 गांवों की दयनीय स्थिति पर प्रकाश डालते हुए बताया कि इन क्षेत्रों में अब तक पानी और ड्रेनेज का नेटवर्क तैयार नहीं हो पाया है।
वादों की सत्यता जानें लोग
शहर अभियंता अनिरुद्ध पावसकर ने प्रशासन का पक्ष रखते हुए स्वीकार किया कि पुणे का क्षेत्रफल 500 वर्ग किलोमीटर तक बढ़ने से बुनियादी सुविधाओं पर दबाव बढ़ा है। उन्होंने बताया कि ‘अमृत’ योजना और ’24×7 जल आपूर्ति परियोजना’ के तहत काम जारी है, लेकिन इसे पूर्ण होने में समय लगेगा, सदन के दबाव के बीच प्रशासन ने महत्वपूर्ण घोषणा की कि अब बिल्डरों द्वारा दिए गए सभी शपथपत्र पुणे मनपा की वेबसाइट पर सार्वजनिक किए जाएंगे, ताकि घर खरीदने से पहले नागरिक बिल्डर के वादों की सत्यता जान सकें।
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पुरानी टंकियों का निर्माण क्यों अटका ?
उपमहापौर परशुराम वाडेकर ने चिखलवाड़ी और बोपोडी जैसे पुराने क्षेत्रों में पिछले सात वर्षों से बनी टैंकर निर्भरता पर नाराजगी जताई। उन्होंने पूछा कि मंजूरी मिलने के बावजूद पानी की टंकियों का निर्माण कार्य क्यों अटका है? अंत में, महापौर मंजुषा नागपुरे ने प्रशासन को सख्त निर्देश दिए कि बिल्डरों की वादाखिलाफी और जल संकट के निवारण हेतु एक स्पष्ट नीति तैयार कर तुरंत सदन के समक्ष रखी जाए।
