पुणे विश्वविद्यालय में 6 करोड़ गबन का आरोप: विभाग प्रमुख छुट्टी पर, फॉरेंसिक ऑडिट के आदेश
Pune University में आदिवासी विभाग से जुड़े कथित 6 करोड़ रुपये के गबन मामले में बड़ा एक्शन लिया गया है। विभाग प्रमुख को छुट्टी पर भेजा गया और सात साल के कार्यकाल का फॉरेंसिक ऑडिट कराने का फैसला हुआ।
- Written By: अपूर्वा नायक
पुणे विश्वविद्यालय (सौ. सोशल मीडिया )
Pune University Financial Irregularity: सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय के आदिवासी विभाग में हुए कथित वित्तीय अनियमितता के मामले में बड़ी कार्रवाई करते हुए विश्वविद्यालय कुलपति और अधिसभा (सिनेट) के अध्यक्ष डॉ। सुरेश गोसावी ने सूचना एवं प्रौद्योगिकी विभाग के प्रमुख डॉ आदित्य अभ्यंकर को जबरन छुट्टी पर भेजने का निर्णय लिया है।
इसके साथ ही कुलपति ने यह भी घोषणा की है कि विश्वविद्यालय के वर्ष 2017 से 2024 तक के कार्यकाल का फॉरेन्सिक ऑडिट कराया जाएगा, जिसके लिए एक महीने के भीतर टेंडर जारी कर दी जाएगी। शुक्रवार को विश्वविद्यालय की बजट सत्र वाली अधिसभा की शुरुआत भारी हंगामे के साथ हुई।
सिनेट सदस्यों ने आदिवासी विभाग के कार्यों में करीब 6 करोड़ रुपये के गबन का आरोप लगाते हुए डॉ। अभ्यंकर के तत्काल निलंबन और पिछले सात वर्षों के कामकाज के फॉरेन्सिक ऑडिट की मांग को लेकर प्रशासन को घेरा। इस चर्चा में विनायक आंबेकर, सचिन गोरडे पाटिल, अपूर्व हिरे और वैभव दीक्षित सहित कई सदस्यों ने सक्रिय रूप से भाग लिया।
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सदन में बढ़ते तनाव को देखते हुए डॉ गोसावी ने सभा को दस मिनट के लिए स्थगित कर दिया था। सभा दोबारा शुरू होने पर सदस्यों के कड़े रुख को देखते हुए कुलपति ने डॉ। अभ्यंकर के खिलाफ कार्रवाई की घोषणा की।
इस पूरे प्रकरण की जांच एक पांच सदस्यीय समिति करेगी, जिसमें पूर्व न्यायाधीश और चार्टर्ड अकाउंटेंट शामिल होंगे। समिति की रिपोर्ट के आधार पर ही डॉ। अभ्यंकर पर अंतिम अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी।
महंगाई के इस दौर में’ कमाओ और सीखो योजना का मानधन बढ़ाना और छात्रवृत्ति समय पर देना अनिवार्य है। यदि प्रशासन ने छात्रों के इन बुनियादी प्रश्नों की अनदेखी की, तो हमारा आंदोलन और भी तीव्र होगा।
– अभिषेक शेलकर, पुणे विश्वविद्यालय यूनिट
विश्वविद्यालय के कैटीन में गैस की किल्लत के कारण छात्रों के सामने 66 भोजन का संकट खड़ा हो गया है। प्रशासन को इन समस्याओं का तुरंत समाधान करना चाहिए अन्यथा विद्यार्थी और भी आक्रामक रुख अपनाएंगे।
– नितिन आंधले, छात्र प्रतिनिधि
ऑडिट में कई बड़ी खामियां उजागर
फॉरेंसिक ऑडिट की आवश्यकता इसलिए पड़ी क्योंकि वर्ष 2016-17 से 2022-23 के बीच के ऑडिट में कई गंभीर खामियां पाई गई थीं। भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) द्वारा उठाए गए कई सवालों का जवाब विश्वविद्यालय पिछले 5 वर्षों में नहीं दे पाया है।
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जब विश्वविद्यालय के वित्त एवं लेखा अधिकारी ने इस रिपोर्ट को समिति के सदस्यों को भेजा, तब विनायक आंबेकर के जरिए इन अनियमितताओं का खुलासा हुआ। तत्कालीन कुलपतियों के कामकाज पर भी सवाल उठाए गए थे, जिसके बाद प्रशासन ने किसी बाहरी संस्था के जरिए निष्पक्ष फॉरेन्सिक ऑडिट कराने का निर्णय लिया है।
