अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस: विविधता में एकता का संदेश, पुणे में हिंदी-मराठी का संगम
Pune Cultural Capital: अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर पुणे में हिंदी और मराठी के गहरे रिश्तों का जश्न मनाया जा रहा है। ‘पुणेरी’ संस्कृति और हिंदी की व्यापकता ने शहर को भाषाई सद्भाव का मॉडल बनाया है।
- Written By: अंकिता पटेल
International Mother Language ( सोर्स: सोशल मीडिया )
Pune International Mother Language: महाराष्ट्र की सांस्कृतिक राजधानी पुणे, जो अपनी समृद्ध मराठी विरासत के लिए विख्यात है, ‘अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस’ के अवसर पर हिंदी और मराठी के बीच के गहरे रिश्तों का जश्न मना रही है। ‘पुणेरी’ संस्कृति की मिठास और राष्ट्रभाषा हिंदी की व्यापकता ने मिलकर इस शहर को भाषाई सद्भाव का एक अनूठा मॉडल बना दिया है।
साहित्यिक उत्सव और कवियों का संगम
पुणे के साहित्य केंद्रों में आज मराठी और हिंदी के कवियों ने एक साथ काव्य पाठ कर यह संदेश दिया कि भाषाएं जोड़ने का काम करती हैं, बांटने का नहीं।
साहित्यकार अवनीश ने कहा कि पुणे में हिंदी केवल कामकाजी भाषा नहीं, बल्कि एक जीवंत कला माध्यम बन चुकी है। शहर में आयोजित होने वाले हिंदी कवि सम्मेलन और ‘हिंदी पखवाड़े’ इस बात का प्रमाण हैं कि यहां के स्थानीय मराठी साहित्यकारों और हिंदी कवियों ने मिलकर एक साझा मंच तैयार किया है।
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संवाद का सेतु बनी हिंदी शिक्षा और आईटी हब होने के नाते पुणे में पूरे भारत से लोग आते हैं। यहाँ हिंदी एक ‘संपर्क भाषा’ (लिंगुआ फ्रैंका) के रूप में कार्य करती है।
पुणेकर मातृभाषा मराठी पर अटूट गर्व करते हैं, लेकिन साथ ही हिंदी को दिल से अपनाते हैं ताकि देश के विभिन्न हिस्सों से आए छात्रों और पेशेवरों के साथ संवाद बना रहे। शहर के औद्योगिक और व्यापारिक विकास में हिंदी की भूमिका अब अपरिहार्य हो चुकी है।
प्रसार में संस्थाओं का योगदान
हिंदी के प्रचार-प्रसार में पुणे के सरकारी विभाग, रेलवे, बैंक और निजी संस्थाएं अत्यंत सक्रिय हैं। रेलवे स्टेशनों पर सूचनाओं से लेकर तकनीकी कंपनियों के ऐप्स तक, हर स्तर पर हिंदी को प्राथमिकता दी जा रही है।
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पुणे यह मिसाल पेश कर रहा है कि कैसे अपनी जड़ों (मराठी) से जुड़े रहकर हिंदी के साथ मिलकर एक सर्व-समावेशी समाज बनाया जा सकता है।
आज मनाया जा रहा अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस
हिंदी भारत की 6 मिट्टी से उपभी वह संवेदनशील भाषा है, जो देश की विविध संस्कृतियों को एक सेतु के रूप में जोड़ती है। यह विभाजन की नहीं, अपितु आत्मीय संवाद और भारतीय अस्मिता की भाषा है।
– पुणे,साहित्यकार, अवनीश
