पार्थ पवार की कंपनी को मिली ‘तारीख पर तारीख’! 21 करोड़ के स्टांप विवाद में फिर टली सुनवाई
Parth Pawar Amadea Enterprises: पार्थ पवार की कंपनी 'अमेडिया' के ₹21 करोड़ स्टांप शुल्क मामले में सुनवाई टली। चुनाव ड्यूटी पर गए आईजी रवींद्र बिनवड़े, जानें क्या है मुंढवा जमीन विवाद।
- Written By: प्रिया जैस
पार्थ पवार (सौजन्य-सोशल मीडिया)
Parth Pawar Mundhwa Land Scam: मुंढवा में सरकारी जमीन के दुरुपयोग के मामले में दस्तावेजीकरण के दौरान पार्थ पवार (Parth Pawar) की एमेडिया कंपनी द्वारा स्टांप शुल्क नहीं भरने के मामले में रजिस्ट्रेशन विभाग ने सुनवाई को फिर आगे बढ़ा दिया। रजिस्ट्रेशन महानिरीक्षक रविंद्र बिनवड़े को पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में पर्यवेक्षक के रूप में तैनात किया गया है, इसलिए यह सुनवाई नहीं हो सकी।
सूत्रों के अनुसार, सुनवाई की अगली तारीख जल्द ही घोषित की जाएगी। इस बीच, इस मामले की सुनवाई रजिस्ट्रेशन महानिरीक्षक के पास ही चल रही है और खारगे समिति ने सुझाव दिया है कि रजिस्ट्रेशन महानिरीक्षक ही गुणवत्ता पर निर्णय लेंगे, इसलिए अगली सुनवाई में इस पर निर्णय आने की उम्मीद है।
जुर्माना भरने के दिए थे आदेश
मुंढवा में बॉटैनिकल सर्वे ऑफ इंडिया की जमीन के दुरुपयोग में स्टांप शुल्क न भरने के बाद सह-जिला रजिस्ट्रार कार्यालय ने सात प्रतिशत स्टांप शुल्क यानी 21 करोड़ रुपये के साथ 20 मई 2025 से दस्तावेजीकरण की तारीख से आज तक 1 प्रतिशत जुर्माना भरने के आदेश दिए थे।
सम्बंधित ख़बरें
सावधान! पंढरपुर वारी के चलते पुणे-पंढरपुर हाईवे के ट्रैफिक में बड़ा बदलाव; 10 से 15 जुलाई तक इन रास्तों का करें
पुणे में बारिश का कहर: 10,271 लोगों का रेस्क्यू, 3 की मौत, कई सड़कें और पुल बंद
पुणे में आषाढ़ी वारी के लिए विशेष बस सेवा: 11-12 जुलाई को चलेंगी अतिरिक्त PMPML बसें, वैकल्पिक मार्ग तय
पुणे के 72 भूस्खलन प्रभावित गांवों का पुनर्वास अधूरा, 412 करोड़ की योजना पर धीमी रफ्तार, 28 प्रस्ताव लंबित
यह भी पढ़ें – बारामती में सियासी बवाल, खड़गे-राहुल के दरबार पहुंचीं सुनेत्रा पवार, क्या निर्विरोध होगा चुनाव?
दस्तावेजों की पूर्ति के लिए समय बढ़ाने की मांग
राशि को जमा करने के लिए 2 महीनों की अवधि दी गई थी। यह अवधि 12 फरवरी को समाप्त हुई, इसके बाद कंपनी ने विभाग के सामने सुनवाई के लिए आवेदन किया। इसके अनुसार सुनवाई 3 मार्च को हुई। इसमें भी दस्तावेजों की पूर्ति के लिए समय बढ़ाने की मांग की गई। चूंकि यह मामला अर्थ न्यायिक प्रकृति का है, इसलिए विभाग ने समय बढ़ाने की माग स्वीकार की।
