Needle-Free Vaccination Pune (फोटो क्रेडिट-इंस्टाग्राम)
Needle-Free Vaccination Pune: पुणे के बाल चिकित्सा स्वास्थ्य देखभाल परिदृश्य में एक क्रांतिकारी बदलाव देखा जा रहा है। पारंपरिक सुइयों के डर को दूर करते हुए, शहर के बाल रोग विशेषज्ञ अब ‘सुई-मुक्त इंजेक्शन प्रणाली’ (Needle-Free Injection System) को तेजी से अपना रहे हैं। यह नवाचार न केवल नैदानिक प्रभावशीलता सुनिश्चित कर रहा है, बल्कि बच्चों और माता-पिता के लिए टीकाकरण के भावनात्मक अनुभव को भी पूरी तरह से बदल रहा है।
हाल ही में पिंपरी-चिंचवड़ स्थित न्यू लाइफ चाइल्ड केयर क्लिनिक एंड हॉस्पिटल में डॉ. अनुपमा अवचत के नेतृत्व में एक विशेष टाइफाइड टीकाकरण पहल की गई, जहाँ इस तकनीक के सकारात्मक परिणाम स्पष्ट रूप से देखने को मिले।
अक्सर बच्चों में टीकाकरण का नाम सुनते ही सुई का डर (Trypanophobia) हावी हो जाता है, जो उनके भविष्य के स्वास्थ्य सेवा अनुभवों को प्रभावित करता है। सुई-मुक्त तकनीक इस संकट को जड़ से खत्म कर रही है। डॉक्टरों ने देखा है कि टीकाकरण के दौरान बच्चे अब पहले की तुलना में अधिक शांत रहते हैं और माता-पिता भी प्रक्रिया को लेकर अधिक आश्वस्त नजर आते हैं। यह कोमल दृष्टिकोण टीकाकरण यात्रा को बच्चों के लिए कम डरावना और अधिक प्रबंधनीय बना रहा है।
ये भी पढ़ें- NDA में शामिल होंगी सुप्रिया सुले? एनसीपी विलय और अजित पवार की मौत के बाद पहली बार दिया बड़ा बयान
इंटीग्रिमेडिकल की नीडल-फ्री इंजेक्शन सिस्टम (N-FIS) जैसी आधुनिक प्रणालियाँ पारंपरिक धातु की सुई के बजाय एक नियंत्रित, उच्च दबाव वाली सूक्ष्म धारा (High-pressure stream) का उपयोग करती हैं।
नैदानिक प्रभावशीलता: यह तकनीक दवा को सीधे ऊतकों तक पहुंचाती है, जिससे टीके की प्रभावशीलता पर कोई असर नहीं पड़ता।
रोगी का आराम: सुई के चुभने का अहसास न होने के कारण दर्द और सूजन की संभावना न के बराबर रहती है।
सुरक्षा: सुई से होने वाली चोटों (Needle-stick injuries) और संक्रमण के जोखिम को भी यह प्रणाली पूरी तरह समाप्त कर देती है।
पुणे अब देश के उन शुरुआती शहरों में शामिल हो गया है जहाँ टीका वितरण में इस तरह के नवाचार को रोजमर्रा की बाल चिकित्सा देखभाल का हिस्सा बनाया जा रहा है। इंटीग्रिमेडिकल की इस तकनीक को डॉक्टरों के बीच मिल रही स्वीकृति यह दर्शाती है कि भविष्य में निवारक स्वास्थ्य सेवा अधिक बच्चों के अनुकूल होने वाली है। स्थापित प्रोटोकॉल में बदलाव किए बिना यह तकनीक न केवल चिकित्सकीय रूप से प्रभावी है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं को भी प्राथमिकता देती है।