दौंड के पार्षद रोहित पाटिल का कुणबी जाति प्रमाणपत्र फर्जी निकला, समिति की कार्रवाई से पार्षद पद पर खतरा

Pune Crime News: दौंड नगर परिषद के पार्षद रोहित पाटिल का कुणबी (ओबीसी) जाति प्रमाणपत्र जांच में फर्जी पाया गया। बिना ब्लड रिलेशन वाले दस्तावेज सौंपने पर समिति ने यह कड़ी कार्रवाई की।
Daund corporator Rohit Patil's Kunbi OBC caste certificate was invalidated by the verification committee for using fake documents, putting his political post at risk.
दौंड पार्षद (फोटो सोर्स- सोशल मीडिया)
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Pune Rohit Patil Fake Caste Certificate: दौंड नगर परिषद के पार्षद रोहित पाटिल का कुणबी (ओबीसी) जाति प्रमाणपत्र जिला जाति प्रमाणपत्र सत्यापन समिति ने जांच के बाद फर्जी पाया गया। रोहित पाटिल ने अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए आरक्षित सीट से चुनाव जीता था, लेकिन उनके इस प्रमाणपत्र को फर्जी दावों के आधार पर चुनौती दी गई थी। समिति के इस कड़े फैसले के बाद अब पाटिल का पार्षद पद पूरी तरह से खतरे में पड़ गया है, जिससे स्थानीय राजनीति में भारी हड़कंप मच गया है।

इस संदर्भ में रतन जाधव, एड। सुशांत वाघमारे, सचिन कुलथे, मृणाल ढोले पाटिल, अनिकेत भागवत आदि शिकायतकर्ता के वकील मंगेश ससाणे ने दी जानकारी के अनुसार, रोहित पाटिल ने कुणबी प्रमाणपत्र हासिल करने के लिए ऐसे लोगों के दस्तावेजों का इस्तेमाल किया था, जिनसे उनका कोई ब्लड रिलेशन नहीं था। इस धोखाधड़ी के खिलाफ समिति के समक्ष कई सुनवाइयां हुई।

फर्जी दावों पर दी चुनौती

मामले की अंतिम सुनवाई लगभग 5.30 घंटे तक चली, जिसमें वकील ने करीब 2.30 घंटे तक जोरदार बहस की। जांच में यह भी सामने आया कि पाटिल ने एक ही मामले में शपथ पत्र देकर दो अलग-अलग ब्लड रिलेशन पेश की थीं, जिससे उनकी धोखाधड़ी पकड़ी गई। इसके अलावा, रोहित पाटिल ने समिति को गुमराह करने के लिए परस्पर विरोधी शैक्षणिक जानकारियां और झूठे सबूत भी दाखिल किए थे।

उन्होंने अपने मामले में ऐसे लोगों के कुणबी रिकॉर्ड जोड़े थे, जिनका उनके पूर्वजों से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं था। वकील ससाणे ने कहा कि समिति ने इन सभी फर्जी दस्तावेजों को खारिज करते हुए ओबीसी समुदाय के साथ न्याय किया है। इसके साथ ही उन्होंने आशंका जताई है कि राज्य के अन्य हिस्सों में भी ऐसे ही फर्जी प्रमाणपत्र बांटे गए हैं, जिनकी गहन जांच होनी चाहिए।

राजनीतिक गलियारों में मची खलबली

  • इस ऐतिहासिक फैसले के बाद अब पुणे और उसके आसपास के राजनीतिक गलियारों में खलबली मच गई है। माना जा रहा है कि इस निर्णय के बाद आने वाले दिनों में कई अन्य नेताओं के जाति प्रमाणपत्रों की भी बारीकी से जांच की जा सकती है।
  • फर्जी दस्तावेजों के सहारे चुनाव जीतने वाले जनप्रतिनिधियों पर अब कानूनी कार्रवाई की तलवार लटक गई है। इस कार्रवाई ने यह साफ कर दिया है कि भविष्य में आरक्षण का लाभ केवल वास्तविक हकदारों को ही मिलेगा।
  • अधिवक्ता मंगेश ससाणे ने कहा कि इस समिति के पास पुणे मनपा, पिपरी चिंचवड़ मनपा और जिले के अन्य स्थानीय निकायों के प्रमाणपत्रों की सुनवाइयां लंबित हैं। हमें उम्मीद है कि जाति सत्यापन समिति सभी मामलों में योग्यता के आधार पर ही निर्णय लेगी। जिनके पास असली और सच्चे रिकॉर्ड हैं, केवल उन्हें ही वैध प्रमाणपत्र दिया जाना चाहिए।
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