परभणी महानगरपालिका (सोर्स: सोशल मीडिया)
Parbhani Municipal Election Candidates List: महाराष्ट्र के परभणी और नांदेड़ महानगरपालिका चुनावों में इस बार लोकतांत्रिक मूल्यों से ज्यादा राजनीतिक विरासत की चर्चा तेज है। लगभग सभी प्रमुख राजनीतिक दलों ने चुनावी जीत सुनिश्चित करने के लिए ‘परिवारवाद’ का सहारा लिया है। पार्टी के निष्ठावान कार्यकर्ताओं की अनदेखी कर नेताओं ने अपनी पत्नियों, पुत्रों और भाइयों को प्राथमिकता दी है, जिससे चुनावी गलियारों में आंतरिक असंतोष के साथ-साथ मतदाताओं के बीच भी नई बहस छिड़ गई है।
पूर्व मंत्रियों और दिग्गजों की साख दांव पर परभणी महानगरपालिका में राजनीतिक रसूख रखने वाले परिवारों ने अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए अनुभवी चेहरों को मैदान में उतारा है।
वरपुड़कर परिवार: कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थामने वाले पूर्व मंत्री सुरेश वरपुड़कर की पत्नी और पूर्व महापौर मीना वरपुड़कर प्रभाग क्रमांक 5 से अपनी किस्मत आजमा रही हैं। 2017 से 2019 के बीच महापौर रह चुकीं मीना वरपुड़कर अपने अनुभव के दम पर मतदाताओं को रिझाने की कोशिश कर रही हैं।
देशमुख परिवार: पूर्व विधायक और पूर्व नगराध्यक्ष सुरेश देशमुख के पुत्र गणेश देशमुख प्रभाग क्रमांक 1 से दूसरी बार चुनावी रण में उतरे हैं। पिता की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाना उनके लिए बड़ी चुनौती है।
जामकर परिवार: दिवंगत पूर्व मंत्री रावसाहेब जामकर के पुत्र विजयराव जामकर इस बार लगातार पांचवीं बार चुनावी अखाड़े में हैं। पूर्व में स्थायी समिति के सभापति और विपक्ष के नेता रह चुके जामकर परभणी की राजनीति का बड़ा चेहरा माने जाते हैं।
नांदेड़-वाघाला मनपा चुनाव में भी कमोबेश यही स्थिति बनी हुई है। यहां शिवसेना के भीतर टिकट वितरण को लेकर परिवारवाद का मुद्दा गर्माया हुआ है।
कल्याणकर परिवार: शिवसेना विधायक बालाजी कल्याणकर के पुत्र सुहास कल्याणकर को प्रभाग क्रमांक 1 (ड-सर्वसाधारण) से प्रत्याशी बनाया गया है। विधायक कल्याणकर के राजनीतिक प्रभाव के चलते उनके पुत्र को मिला यह टिकट क्षेत्र में चर्चा का विषय बना हुआ है।
मुंडे परिवार: केवल विधायक ही नहीं, बल्कि पार्टी के संगठन स्तर पर भी परिवारवाद स्पष्ट दिख रहा है। शिवसेना जिला प्रमुख और पूर्व नगरसेवक उमेश मुंडे के सुपुत्र को भी प्रभाग क्रमांक 1 से चुनावी मैदान में उतारा गया है।
यह भी पढ़ें:- बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट में बड़ी सफलता: पालघर में 1.5 KM लंबी सुरंग का काम पूरा, जानें अगले स्टेप
परिवारवाद के इस हावी होते दौर में सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या आम कार्यकर्ता केवल झंडे ढोने के लिए रह गया है? एक तरफ अनुभवी और विरासत वाले उम्मीदवारों की फौज है, तो दूसरी तरफ वे मतदाता हैं जो नए और जुझारू नेतृत्व की तलाश में हैं। परभणी और नांदेड़ की जनता इस ‘वंशवाद’ पर अपनी मुहर लगाती है या किसी नए विकल्प को चुनती है, यह देखना दिलचस्प होगा।
चुनाव की बिसात बिछ चुकी है और मोहरे सेट कर दिए गए हैं। ‘अपनों’ को टिकट दिलाने की होड़ ने यह साफ कर दिया है कि पार्टियों के लिए विचारधारा से ज्यादा पारिवारिक रसूख मायने रख रहा है। फिलहाल पूरे शहर की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या यह राजनीतिक विरासत जीत की गारंटी बनेगी या बदलाव की लहर इसे बहा ले जाएगी।