Vasai Virar के निजी स्कूलों की मनमानी, फीस से लेकर यूनिफॉर्म तक ‘सिंडिकेट’ का आरोप
Vasai Virar में निजी स्कूलों की बढ़ती फीस और जबरन वेंडर सिस्टम से अभिभावक परेशान हैं। यूनिफॉर्म, जूते और किताबों की खरीद में भी स्कूलों की मनमानी पर सवाल उठ रहे हैं।
- Written By: अपूर्वा नायक
वसई विरार प्राइवेट स्कूल (सौ. सोशल मीडिया )
Vasai Virar Private Schools Fee Hike: वसई विरार में रहने वाले मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए आज अपने बच्चों को पढ़ाई सिर्फ शिक्षा का सबब नहीं बल्कि एक भारी आर्थिक और मानसिक बोझ बन गया है।
निजी स्कूलों की चमक-धमक वाली इमारतों के पीछे एक ऐसा ‘सिंडिकेट’ खड़ा हो गया है, जहां अभिभावक खुद को असहाय महसूस कर रहे हैं। स्कूलों की मनमानी ऐसी है कि फीस से लेकर जूते-मोजों तक, सब कुछ स्कूल द्वारा तय वेंडर से ही लेना अनिवार्य है, वरना बच्चों के भविष्य पर तलवार लटकने लगती है।
वसई-विरार के निजी स्कूलों में फीस का ग्राफ रॉकेट की तरह बढ़ रहा है। नर्सरी और प्री-प्राइमरी जैसे शुरुआती स्तरों पर भी फीस 25 से 50 हजार रुपये के बीच है। कई अभिभावकों का आरोप है कि पिछले कुछ वर्षों में फीस में 30 से 35 प्रतिशत तक की वृद्धि की गई है। शिक्षा शुल्क विनियमन अधिनियम होने के बावजूद, स्कूल प्रशासन नियमों को ताक पर रखकर मनमाने ढंग से वसूली कर रहे हैं।
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शिक्षा विभाग ने अब विभागीय शुल्क विनियमन समितियों और समीक्षा समितियों को सक्रिय कर दिया है। यदि आपका स्कूल मनमानी फीस मांगता है या किसी विशेष दुकान से सामान खरीदने का दबाव डालता है, तो आप जिला शिक्षा अधिकारी या विभागीय समिति को लिखित शिकायत दे सकते हैं।
– जिला शिक्षा विभाग
क्या कहता है कानून ?
शिक्षा विभाग ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि कोई भी निजी स्कूल परिसर में किताबें या ड्रेस नहीं बेच सकता। स्कूलों को अपने नोटिस बोर्ड परविभागीय शुल्क विनियामक समिति (डीएफआरसी) की जानकारी और शिकायत करने का तरीका प्रदर्शित करना अनिवार्य है। स्कूलों में फीस वृद्धि के खिलाफ अभिभावक अब इन समितियों में अपील कर सकते हैं।
जिले के सैकड़ों स्कूल बिना मान्यता के चल रहे है और खुलेआम लूट मचा रहे हैं। विभाग की चुप्पी चिंताजनक है। शिक्षा विभाग ने सभी प्राइवेट स्कूलों को किताबें और स्कूल ड्रेस बेचने पर पूरी तरह से पाबंदी लगाया है, शिक्षा विभाग अपने आदेश में स्कूलों के खिलाफ कार्रवाई करने की बात कही है, लेकिन पालघर जिले के ज्यादातर प्राइवेट स्कूल खुलेआम किताबें और स्कूल ड्रेस की बिक्री कर रहे हैं। इसमें जिले के सैकड़ों स्कूल वो भी शामिल हैं, जो जिला शिक्षा विभाग के बिना किसी मान्यता के संचालित हैं और अभिभावकों से 8 हजार से 15 हजार रुपए तक वसूल रहे हैं,
– धर्मेंद्र निगम, राष्ट्रीय महासचिव, परिवर्तन संघटना
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किताबें और ब्रांड के जूते : मजबूरी का फायदा
अभिभावक राहुल सिंह बताते हैं, स्कूल में बच्चों के लिए एक ही ब्राड के जूते अनिवार्य किए गए हैं। एक जोड़ी की कीमत करीब 1500 रुपये है। पीटी, रेगुलर और रेन शूज के नाम पर ही 4 हजार रुपये तक खर्च हो जाते हैं, बाहर सस्ते विकल्प होने के बावजूद स्कूल प्रशासन अनुमति नहीं देता। स्कूल में सब खरीदना होगा सिर्फ जूते ही नहीं, आठवीं कक्षा तक के छात्रों के लिए तीन-तीन अलग यूनिफॉर्म और हर साल नई किताबें खरीदने का दबाव बनाया जाता है। वेडर्स के साथ स्कूलों का सीधा तालमेल (कमीशन का खेल) होने के कारण अभिभावकों के पास कोई विकल्प नहीं बचता।
