वीर सावरकर पुण्यतिथि: काला पानी की वो खौफनाक सजा और आत्मार्पण की अनसुनी कहानी, कैसे विनायक बने स्वातंत्र्यवीर?
Veer Savarkar Death Anniversary: आज देश प्रखर राष्ट्रवादी सावरकर की पुण्यतिथि मना रहा है। जानिए उनकी दोहरे आजीवन कारावास की यातनाएं, हिंदुत्व की परिभाषा और क्यों उन्होंने स्वेच्छा से प्राण त्यागे थे।
- Written By: आकाश मसने
विनायक दामोदर सावरकर (सोर्स: सोशल मीडिया)
Veer Savarkar History In Hindi: आज 26 फरवरी को देश विनायक दामोदर सावरकर की पुण्यतिथि मना रहा है। प्रखर राष्ट्रवादी विचारक, लेखक और स्वतंत्रता सेनानी के रूप में उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में अहम भूमिका निभाई। अंडमान की कुख्यात सेलुलर जेल में कठोर यातनाएं सहते हुए भी उनका संकल्प अडिग रहा। ‘हिंदुत्व’ की वैचारिक परिभाषा, 1857 के संग्राम पर लिखी पुस्तक और सामाजिक सुधार के प्रयासों ने उन्हें समर्थकों के लिए प्रेरणा और आलोचकों के लिए बहस का विषय बनाया। आइए आज उनकी पुण्यतिथि के अवसर पर उनके जीवन से जुड़ी कुछ बातों को जानते हैं।
आज 26 फरवरी 2026 को पूरा देश प्रखर राष्ट्रवादी विचारक और स्वतंत्रता सेनानी विनायक दामोदर सावरकर की पुण्यतिथि मना रहा है। उनके समर्थकों के लिए वह एक ‘क्रांतिकारी सूर्य’ हैं, जिन्होंने अंडमान की सेलुलर जेल की दीवारों पर कोयले से कविताएं लिखकर अपनी वैचारिक क्रांति को जीवित रखा।
वीर सावरकर किस जाति से थे?
वीर सावरकर का जन्म 28 मई 1883 को महाराष्ट्र के नासिक जिले के भागुर गांव में हुआ था। वह चितपावन ब्राह्मण परिवार से ताल्लुक रखते थे। हालांकि, उन्होंने अपने जीवन में जाति व्यवस्था और छुआछूत जैसी कुरीतियों का कड़ा विरोध किया। महाराष्ट्र के रत्नागिरी में विनायक दामोदर सावरकर की प्रेरणा से भगोजी शेठ कीर ने पतित पावन मंदिर की स्थापना की थी, जहां सभी जातियों के लोगों को प्रवेश की अनुमति थी।
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वीर सावरकर को कितनी सजा सुनाई गई थी?
वीर सावरकर को ब्रिटिश सरकार द्वारा दो जन्मों के कारावास (दो आजीवन कारावास) की सजा सुनाई गई थी। यह कुल 50 वर्षों की सजा थी। ब्रिटिश सरकार ने 24 दिसंबर 1910 और 31 जनवरी 1911 को नासिक कलेक्टर जैक्सन की हत्या और भड़काऊ भाषणों के लिए दोषी ठहराया और 25-25 साल की दो उम्रकैद की सजा सुनाई। उन्हें 4 जुलाई 1911 को अंडमान की सेलुलर जेल (काला पानी) भेज दिया गया, जहां उन्हें 1921 तक भयानक यातनाएं सहनी पड़ी। इतिहास में वे शायद इकलौते ऐसे राजनीतिक कैदी थे जिन्हें एक साथ दो आजीवन कारावास दिए गए थे।
वीर सावरकर की मृत्यु कब और कैसे हुई?
वीर सावरकर की मृत्यु 26 फरवरी 1966 को हुई थी। उनका निधन किसी बीमारी से नहीं, बल्कि एक स्वेच्छापूर्ण आध्यात्मिक निर्णय से हुई थी। उन्होंने ‘आत्मार्पण’ (उपवास द्वारा मृत्यु का वरण) करने का निर्णय लिया था। उन्होंने अन्न-जल त्याग दिया था, क्योंकि उनका मानना था कि जब जीवन का उद्देश्य पूरा हो जाए और शरीर समाज सेवा के योग्य न रहे, तो उसे त्याग देना ही उचित है। उन्होंने 83 वर्ष की आयु में अंतिम सांस ली।
वीर सावरकर को विवादित क्रांतिकारी क्यों कहा जाता है?
वीर दामाेदर सावकर को विवादित क्रांतिकारी कहने के पीछे कई कारण सामने आते है। उनका नाम महात्मा गांधी की हत्या मामले में भी सामने आया था। साल 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के छठवें दिन सावरकर को हत्या के षड्यंत्र में शामिल होने के लिए मुंबई से गिफ्तार कर लिया गया था। हालांकि उन्हें फरवरी 1949 में बरी कर दिया गया था।
दया याचिकाएं: सावरकर को विवादित क्रांतिकारी कहने के पीछे दया याचिकाएं भी मुख्य कारण में शामिल है। सेलुलर जेल में रहने के दौरान उन्होंने ब्रिटिश सरकार को माफीनामे या दया याचिकाएं लिखी थीं। समर्थक इसे ‘रणनीति’ कहते हैं, जबकि आलोचक इसे ‘समझौता’ मानते हैं।
हिंदुत्व की विचारधारा: वीर सावरकर ने ‘हिंदुत्व’ शब्द को परिभाषित किया और द्वि-राष्ट्र सिद्धांत की बात की, जिससे आधुनिक राजनीति में उन्हें लेकर मतभेद बने रहते हैं।
RSS के दूसरे सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर के साथ विनायक दामोदर सावरकर (सोर्स: सोशल मीडिया)
वीर सावरकर के बारे में रोचक तथ्य
समुद्र में छलांग: 1910 में जब वीर सावरकर को जहाज से भारत लाया जा रहा था, तो वे फ्रांस के ‘मार्सेल्स’ बंदरगाह पर समुद्र में कूद गए थे।
लेखक और कवि: उन्होंने ‘द इंडियन वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस 1857’ जैसी प्रसिद्ध पुस्तक लिखी।
विदेशी वस्तुओं की होली: सावरकर ने पुणे में विदेशी कपड़ों की पहली सार्वजनिक होली जलाई थी।
वीर सावरकर कितने साल जेल में रहे?
वीर सावरकर को 1910 में गिरफ्तार किया गया था और उन्हें 1911 में अंडमान की कुख्यात सेलुलर जेल भेज दिया गया, जहां वे 1911 से 1921 तक लगभग 10 वर्ष 9 महीने यानी करीब 11 वर्ष तक बंद रहे। इसके बाद 1921 से जनवरी 1924 तक उन्हें महाराष्ट्र के रत्नागिरी और यरवदा जेल में रखा गया। 6 जनवरी 1924 को उन्हें सशर्त रिहाई मिली, हालांकि 1937 तक उन पर विभिन्न प्रकार की राजनीतिक और आवागमन संबंधी पाबंदियां लागू रहीं।
सावरकर को वीर की उपाधि किसने दी थी?
1936 में कांग्रेस के साथ एक बयान को लेकर विवाद के बाद विनायक दामोदर सावरकर का तीखा विरोध होने लगा और उन्हें सार्वजनिक कार्यक्रमों में घेरने की कोशिशें की जाती थीं। इसी दौर में मशहूर पत्रकार, शिक्षाविद, लेखक और रंगकर्मी प्रल्हाद केशव अत्रे ने खुलकर उनका समर्थन करने का फैसला किया। अत्रे युवावस्था से ही सावरकर के विचारों और संघर्ष से प्रभावित थे।
पुणे में अपने बालमोहन थिएटर के एक कार्यक्रम के तहत अत्रे ने सावरकर के सम्मान में एक भव्य स्वागत समारोह रखा। कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने इसका विरोध किया, पर्चे बांटे और काले झंडे दिखाने की चेतावनी दी। विरोध के बावजूद हजारों लोग कार्यक्रम में पहुंचे और समारोह सफलतापूर्वक संपन्न हुआ।
पुणे के एक कार्यक्रम में मौजूद वीर सावरकर की तस्वीर (सोर्स: सोशल मीडिया)
अपने भाषण में अत्रे ने कहा कि “जो काला पानी की सज़ा से नहीं डरा, वह काले झंडों से क्या डरेगा?” इसी संबोधन के साथ उन्होंने सावरकर को ‘स्वातंत्र्यवीर’ की उपाधि दी। समय के साथ यही शब्द संक्षेप में ‘वीर’ बन गया और उनके नाम के साथ स्थायी रूप से जुड़ गया।
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कैसे बने सावरकर ‘स्वातंत्र्यवीर’?
जेल में रहते हुए सावरकर ने 1857 के स्वतंत्रता संग्राम पर चार भागों में विस्तृत मराठी ग्रंथ ‘1857 चे स्वातंत्र्य समर’ लिखा था। यह कृति अत्यंत चर्चित हुई और क्रांतिकारी विचारों का प्रतीक मानी गई। इसी पुस्तक के प्रभाव से प्रेरित होकर अत्रे ने उन्हें ‘स्वातंत्र्यवीर’ की संज्ञा दी थी। सावरकर का पूरा जीवन ही स्वतंत्रता की वेदी पर समर्पित था। विदेशी धरती (लंदन) में ‘इंडिया हाउस’ के जरिए क्रांतिकारियों को संगठित करने से लेकर, जेल की अमानवीय यातनाएं सहने तक, उनकी निष्ठा कभी नहीं डिगी। उनके इसी जुझारूपन और वैचारिक प्रखरता के कारण देश ने उन्हें ‘स्वातंत्र्यवीर’ के नाम से पुकारा।
कालापानी एक सच्ची कहानी है?
जी हां, कालापानी (सेलुलर जेल) का इतिहास भारतीय संघर्ष की सबसे क्रूर और सच्ची दास्तां है। अंडमान की उस जेल में कैदियों को कोल्हू के बैल की तरह तेल निकालने के लिए जोता जाता था, उन्हें पेट भर खाना नहीं मिलता था और बात-बात पर बेतों से पीटा जाता था। सावरकर ने उन दीवारों पर कीलों और कोयले से अपनी रचनाएं लिखी थीं, जो आज भी वहां के इतिहास में दर्ज हैं।
