Veer Savarkar: सेलुलर जेल की वो 7X11 की कोठरी, जहां सावरकर ने कीलों को कलम और दीवारों को बना दिया था किताब
Veer Savarkar Jayanti: अंडमान की सेलुलर जेल की कोठरी नंबर 7, जहां वीर सावरकर ने अंग्रेजों की अमानवीय यातनाओं के बीच कीलों और पत्थरों से दीवारों पर रच डाला था अमर इतिहास। जानिए पूरी कहानी।
- Written By: आकाश मसने
विनायक दामोदर सावरकर की जयंती आज (डिजाइन फाेटो)
Veer Savarkar Cellular Jail Story: अंडमान का वो नीला समंदर और चारों तरफ पसरा सन्नाटा… आज भले ही यह एक खूबसूरत टूरिस्ट डेस्टिनेशन हो, लेकिन करीब एक सदी पहले इसे सिर्फ एक नाम से जाना जाता था ‘कालापानी’। एक ऐसी भयावह जगह जहां से कोई भी इंसान सिर्फ अपनी मौत की खबर के साथ ही वापस लौट सकता था। इसी खौफनाक इतिहास को अपने सीने में दफन किए खड़ी है सेलुलर जेल की वह कोठरी जहां ब्रिटिश हुकूमत ने भारत के सबसे प्रखर क्रांतिकारी विनायक दामोदर सावरकर को 50 साल की सजा देकर कैद किया था।
अंग्रेज उनका मनोबल तोड़ना चाहते थे, लेकिन सावरकर के दृढ़ संकल्प और वीरता ने जेल की अमानवीय यातनाओं को भी बौना साबित कर दिया। आइए आज वीर सावरकर की जयंती के मौके पर जानते हैं उस वीर की दास्तान, जिसने कागज-कलम छिन जाने पर जेल की दीवारों को ही इतिहास का पन्ना बना दिया।
महाराष्ट्र के नासिक जिले के पास स्थित भागुर गांव में 28 मई 1883 को राधाबाई और दामोदर पंत सावरकर के घर एक बेटे जन्म हुआ, जिसका नाम रखा गया विनायक सावरकर। वे बचपन से ही वे पढ़ाकू तो थे ही साथ ही उन्होंने कुछ कविताएं भी लिखी थीं। 1904 में उन्होंने अभिनव भारत नामक एक क्रान्तिकारी संगठन की स्थापना की। 1905 में बंगाल के विभाजन के बाद उन्होने पुणे में विदेशी वस्त्रों की होली जलाई।
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50 साल की सजा और फांसी के फंदे के सामने ठिकाना
4 जुलाई 1911 को नासिक के कलेक्टर जैक्सन की हत्या की साजिश और ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ युद्ध छेड़ने के आरोप में सावरकर को दोहरे आजीवन कारावास के तहत अंडमान की सेलुलर जेल लाया गया।
अंग्रेज अफसर सावरकर के प्रखर राष्ट्रवाद से खौफ खाते थे। उन्हें जेल की सबसे ऊपरी यानी तीसरी मंजिल की आखिरी कोठरी में आइसोलेशन में रखा गया। इस कोठरी का स्ट्रक्चर इस तरह डिजाइन किया गया था कि सावरकर को अपनी बैरक से बाहर सिर्फ सामने बनी फांसी की कोठरी दिखाई देती थी। ब्रिटिश हुकूमत का मकसद सावरकर की मानसिक शक्ति और मनोबल को तोड़ना था।
अंडमान के सेलुलर जेल की वह कोठरी जहां वीर सावरकर को कैद में रखा गया था (सोर्स: सोशल मीडिया)
जब दीवारें बन गईं किताब और लोहे की कीलें बनीं कलम
जेल के कड़े नियमों के मुताबिक, सेलुलर जेल में कैदियों को न तो किसी से मिलने की इजाजत थी और न ही लिखने के लिए कोई कागज, पेन या पेंसिल दी जाती थी। अंग्रेजों का मानना था कि सावरकर के क्रांतिकारी विचारों को अगर इस कोठरी से बाहर जाने दिया गया तो भारत के मुख्य भूभाग में क्रांति की आग भड़क जाएगी।
वीर सावरकर ने बंदिशों के बीच ही एक नया इतिहास लिख दिया। उन्होंने अपनी कोठरी की चूने से पुती सफेद दीवारों को ही अपना कागज बना लिया। वहीं नुकीले पत्थरों, लोहे की कीलों और कांटों को अपनी कलम बना लिया। कभी-कभी वे कोयले या पत्थरों को घिसकर दीवारों पर लिखने लगे।
सावरकर रोज सुबह उठते, कोठरी की दीवारों पर कीलों से खुरच-खुरचकर कविताएं और अपने वैचारिक दर्शन लिखते थे। जब पूरी दीवार अक्षरों से भर जाती, तो वे हफ्तों तक उन पंक्तियों को बार-बार पढ़कर कंठस्थ करते थे। जब वे पंक्तियां उनके दिमाग में हमेशा के लिए छप जातीं, तो वे जेल के पत्थर से ही उस दीवार को रगड़कर साफ कर देते और अगले दिन फिर से नई कविता लिखना शुरू कर देते।
इसी 7X11 की दमघोंटू कोठरी में वीर सावरकर ने ‘कमला’ और ‘सप्तर्षि’ जैसे कालजयी महाकाव्यों की रचना की। उन्होंने दीवारों पर करीब 10,000 से अधिक पंक्तियां लिखीं और उन्हें अपनी अद्भुत स्मृति में सुरक्षित रखा।
कोल्हू के बैल की तरह पीसना पड़ता था तेल
सावरकर का जेल जीवन सिर्फ कविताएं लिखने तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्हें हर दिन अमानवीय यातनाओं से गुजरना पड़ता था। जेल के अन्य कैदियों की तरह सावरकर को भी कोल्हू में बैल की तरह जोता जाता था। उनसे रोज 30 पाउंड नारियल का तेल निकालने का क्रूर टारगेट दिया जाता था। तेल की मात्रा थोड़ी भी कम होने पर पीठ पर कोड़े बरसाए जाते थे।
विनायक दामोदर सावरकर (फाइल फोटो, सोर्स: सोशल मीडिया)
सावरकर ने अपनी आत्मकथा ‘माई ट्रांसपोर्टेशन फॉर लाइफ’ में लिखा है कि कैसे भूख, प्यास, बेड़ियों और कोड़ों के बीच भी उन्होंने अपने दिमाग और अपनी आत्मा को कभी अंग्रेजों का गुलाम नहीं होने दिया।
यह भी पढ़ें:- वीर सावरकर पुण्यतिथि: काला पानी की वो खौफनाक सजा और आत्मार्पण की अनसुनी कहानी, कैसे विनायक बने स्वातंत्र्यवीर?
दिमाग में छुपाकर जेल से बाहर भेजी गईं कविताएं
अब सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि अगर सावरकर खुद ही दीवारों को खुरचकर मिटा देते थे, तो वे महान कविताएं जेल से बाहर दुनिया के सामने कैसे आईं? इसके पीछे उनकी गजब की फोटोग्राफिक मेमोरी थी। जब जेल में राजनीतिक कैदियों की अदला-बदली होती या कोई कैदी अपनी सजा पूरी करके रिहा होने वाला होता था तब सावरकर अपनी याद की हुई हजारों पंक्तियां उस कैदी को रटा देते थे। उन कैदियों ने सावरकर की कविताओं को अपने दिमाग में काेड की तरह छुपाकर जेल से बाहर निकाला। इस तरह कालेपानी की बंद दीवारों पर लिखी गई क्रांति की यह गूंज भारत के मुख्य भूभाग तक पहुंची और छपी।
साल 1921 में, यानी करीब 10 साल के कठोर कारावास के बाद सावरकर को सेलुलर जेल से रिहा कर भारत के रत्नागिरी जेल में स्थानांतरित किया गया। आज जब आप अंडमान की सेलुलर जेल जाएंगे तो तीसरी मंजिल की वह कोठरी नंबर 7 आज भी राष्ट्र के लिए एक तीर्थस्थल की तरह सुरक्षित है।
