Nashik Kumbh Mela 2027 के लोगो पर छिड़ा विवाद: वैष्णव प्रतीकों को शामिल न करने पर श्रद्धालुओं ने जताई आपत्ति
Nashik Kumbh Mela 2027: नासिक-त्र्यंबकेश्वर सिंहस्थ कुंभ 2027 के नए लोगो में वैष्णव प्रतीकों की अनदेखी पर विवाद शुरू हो गया है। श्रद्धालुओं का तर्क है कि यह आयोजन शैव और वैष्णव परंपराओं का संगम है।
- Written By: रूपम सिंह
Devendra Fadnavis , Eknath Shinde, (Image- Social Media)
Nashik Trimbakeshwar Kumbh Mela Controversy: नासिक-त्र्यंबकेश्वर सिंहस्थ कुंभ मेला 2027 के आधिकारिक बोधचिह्न (लोगो) के अनावरण के बाद सामाजिक माध्यमों पर नया विवाद खड़ा हो गया है। कुछ श्रद्धालुओं और धार्मिक परंपराओं के जानकारों ने बोधचिह्न में वैष्णव परंपरा के प्रतीक ‘राम’ अथवा उर्ध्वपुंड तिलक को स्थान नहीं दिए जाने पर आपत्ति जताई है। सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए अनीता जोशी ने लिखा, सिंहस्थ में ‘राम’ नहीं रहा, यह प्राधिकरण ने सिद्ध कर दिया।
लोगो में वैष्णव प्रतीक जानबूझकर छोड़ा गया क्या? उन्होंने इस विषय पर सार्वजनिक विरोध भी दर्ज कराया। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए अजय शिंदे ने कुंभ मेले की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का उल्लेख करते हुए कहा कि कुंभ मेला 2 शैव और 2 वैष्णव स्थलों पर आयोजित होता है। उनके अनुसार हरिद्वार और प्रयागराज वैष्णव परंपरा से जुड़े हैं, जबकि उज्जैन और त्र्यंबकेश्वर शैव परंपरा के केंद्र माने जाते हैं।
1754 के कुंभ मेले का संदर्भ
अजय शिंदे ने वर्ष 1754 में त्र्यंबकेश्वर में आयोजित कुंभ मेले के दौरान साधु-संतों के बीच हुए हिंसक संघर्ष का भी उल्लेख किया। उनके अनुसार, इसके बाद तत्कालीन पेशवाओं ने समाधान के रूप में शैव साधुओं के लिए त्र्यंबकेश्वर और वैष्णव साधुओं के लिए नासिक में स्नान की व्यवस्था की थी।
सम्बंधित ख़बरें
कचरा ढोने वाली गाड़ी से ले जाया गया शव, जलगांव के अमलनेर की शर्मनाक घटना; देखें झकझोर देने वाला वायरल VIDEO
छत्रपति संभाजीनगर में TET पेपर लीक मामले की निष्पक्ष जांच की मांग, AIMIM का जिलाधिकारी कार्यालय पर प्रदर्शन
अब दोबारा होगी परीक्षा, नहीं देनी होगी फीस; शिक्षा मंत्री दादा भुसे ने किया पारदर्शी एग्जाम का वादा
इंदौर मॉडल पर संवरेगा छत्रपति संभाजीनगर, शहर के सौंदर्यीकरण के लिए ली जाएगी पेंट विक्रेताओं की मदद
लोगो में शामिल प्रतीक
राज्य सरकार की ओर से जारी जानकारी के अनुसार लोगो में जिन प्रतीकों को शामिल किया गया है, उनमें गोदावरी नदी का शिवलिंग स्वरूप, त्र्यंबकेश्वर मंदिर की प्रतिकृति, भगवान शिव का त्रिशूल और क्षेत्रीय सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत को दर्शाने वाली कलात्मक संरचना हैं।
ये भी पढ़ें :- Maharashtra Cabinet Decisions: फडणवीस सरकार का अहम निर्णय, संतरा आयात ड्यूटी रिफंड स्कीम बंद
विरोध करने वालों का पक्ष
कुछ श्रद्धालुओं का कहना है कि सिंहस्थ केवल शैव परंपरा का आयोजन नहीं, बल्कि शैव और वैष्णव दोनों परंपराओं का संगम है। ऐसे में लोगो में वैष्णव परंपरा के किसी प्रतीक को भी स्थान दिया जाना चाहिए था। उनका मानना है कि इससे सभी संप्रदायों का संतुलित प्रतिनिधित्व होता।
प्रशासन का पक्ष
प्रशासन का कहना है कि यह लोगो नासिक और त्र्यंबकेश्वर के भूगोल, धार्मिक परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। लेकिन सोशल मीडिया पर उठे सवालों के बाद इस विषय पर चर्चा और तेज हो गई है। इस विवाद ने एक बड़ा प्रश्न खड़ा कर दिया है कि सिंहस्थ कुंभ मेले जैसे विशाल और सर्वसमावेशी धार्मिक आयोजन के बोधचिह्न में विभिन्न संप्रदायों का प्रतिनिधित्व किस प्रकार किया जाना चाहिए। फिलहाल यह मुद्दा धार्मिक और सामाजिक हलकों में चर्चा का केंद्र बना हुआ है।
