अशोक खरात मामले का ‘साइड इफेक्ट’: रूपाली चाकणकर को एक और झटका, पंचायत चुनाव में भाई की करारी हार
Ruapli Chakankar News: अशोक खरात मामले के बाद रूपाली चाकणकर को झटका, नंदुर ग्राम पंचायत चुनाव में भाई संतोष बोराटे की करारी हार। विशाल थोरात जीते।
- Written By: अनिल सिंह
रूपाली चाकणकर को बड़ा झटका, पंचायत चुनाव में भाई को मिली करारी हार (फोटो क्रेडिट-X)
Rupali Chakankar Brother Santosh Borate Defeat Daund: पुणे जिले की राजनीति में एनसीपी की कद्दावर नेता रहीं रूपाली चाकणकर की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। कथित ढोंगी बाबा कैप्टन अशोक खरात मामले में संलिप्तता के आरोपों के बाद, चाकणकर को अपने महत्वपूर्ण पदों से हाथ धोना पड़ा था। अब इस विवाद का असर उनके घरेलू राजनीतिक प्रभाव पर भी पड़ता दिख रहा है। हाल ही में घोषित हुए ग्राम पंचायत उपचुनावों के नतीजों ने चाकणकर परिवार के लिए नई चिंताएं खड़ी कर दी हैं, जहाँ उनके अपने ही भाई को स्थानीय स्तर पर जनता के कड़े विरोध का सामना करना पड़ा है।
कैप्टन खरात मामले के कारण लगे राजनीतिक दाग के बाद रूपाली चाकणकर ने करीब डेढ़ महीने के अंतराल के बाद सार्वजनिक जीवन में सक्रिय होने का प्रयास किया था। उन्होंने नासिक जिले के नंदुर में अपने समर्थकों के साथ एक बैठक की और इसकी तस्वीर सोशल मीडिया पर साझा करते हुए “गोटावल” (परिजनों का समूह) कैप्शन दिया था। हालांकि, उनकी इस नई शुरुआत के बीच ही दौंड से आई चुनावी हार की खबर ने उनकी रणनीतियों पर पानी फेर दिया है।
नंदुर ग्राम पंचायत में सत्ता परिवर्तन
दौंड तालुका के नंदुर ग्राम पंचायत में सरपंच पद के लिए हुआ उपचुनाव बेहद दिलचस्प और कड़ा रहा। इस चुनाव में मुख्य मुकाबला रूपाली चाकणकर के भाई संतोष बोराटे और विशाल नरेंद्र थोरात के बीच था। चुनाव परिणामों के अनुसार, विशाल थोरात ने संतोष बोराटे को भारी मतों के अंतर से पराजित किया और सरपंच का पद अपने नाम कर लिया। इस जीत ने स्थानीय स्तर पर सत्ता के समीकरणों को पूरी तरह बदल दिया है और इसे चाकणकर के गिरते प्रभाव के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
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हार के पीछे के संभावित कारण
इलाके में चल रही चर्चाओं के अनुसार, संतोष बोराटे की इस करारी हार के पीछे कई कारण बताए जा रहे हैं। स्थानीय मतदाताओं के बीच उनके काम करने के तरीके को लेकर पहले से ही असंतोष व्याप्त था। इसके साथ ही, रूपाली चाकणकर का नाम बड़े विवादों में आने के कारण भी परिवार की छवि को नुकसान पहुँचा है। जानकारों का मानना है कि मतदाताओं ने स्थानीय मुद्दों के साथ-साथ राज्य स्तर पर चल रहे विवादों को भी ध्यान में रखते हुए अपना फैसला सुनाया है।
चाकणकर के राजनीतिक भविष्य पर सवाल
महिला आयोग के अध्यक्ष पद और पार्टी के संगठनात्मक पद से इस्तीफे के बाद, यह हार रूपाली चाकणकर के लिए तीसरा बड़ा झटका है। एक तरफ जहाँ वे अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन वापस पाने की कोशिश कर रही हैं, वहीं दूसरी तरफ घरेलू पिच पर मिली यह शिकस्त उनके विरोधियों को और हमलावर होने का मौका देगी। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या वे इस हार से उबरकर आगामी विधानसभा और स्थानीय निकाय चुनावों में अपनी सक्रियता फिर से साबित कर पाती हैं या नहीं।
