Nashik Kumbh Mela: कुंभ मेले के बजट में ‘कमीशनखोरी’ का आरोप, ठेकेदार महासंघ के दावे से मचा हड़कंप
Nashik Kumbh Mela: ठेकेदार महासंघ का दावा है कि नासिक कुंभ मेले के 30,000 करोड़ के बजट का एक बड़ा हिस्सा कमीशन और जीएसटी में चला जाता है। धरातल पर काम के लिए सिर्फ 44% राशि बचती है।
- Written By: रूपम सिंह
नासिक कुंभ मेले (सोर्स: नवभारत डिजाइन फोटो)
Nashik Kumbh Mela Budget: महाराष्ट्र में सरकारी विकास कार्यों में कथित ‘कमीशनखोरी’ का मुद्दा एक बार फिर चर्चा का विषय बन गया है। कोल्हापुर में आयोजित राज्य सरकारी ठेकेदार महासंघ के अधिवेशन में ठेकेदारों द्वारा किए गए दावों ने पूरे राज्य में खलबली मचा दी है। नासिक में होने वाले आगामी सिंहस्थ कुंभ मेले के लिए आवंटित हजारों करोड़ रुपये के बजट के संदर्भ में यह आरोप और भी गंभीर हो गए हैं।
कमीशन का बंटवारा’ और दावों का आधार
ठेकेदार महासंघ के अनुसार,सरकारी ठेकों की कुल राशि का बड़ा हिस्सा विकास के बजाय विभिन्न मदों में खर्च हो जाता है। ठेकेदारों द्वारा प्रस्तुत किए गए ब्यौरे के अनुसार यह वितरण कुछ इस प्रकार है-
- जनप्रतिनिधिः 10 प्रतिशत
- अधिकारी एवं कर्मचारीः 15 प्रतिशत
- मंत्रालय वरिष्ठ स्तरः 6 से 8 प्रतिशत
- जीएसटीः 15 से 18 प्रतिशत
- ठेकेदार का लाभः 8 प्रतिशत
- इस दावे के मुताबिक, धरातल पर काम के लिए केवल 44 प्रतिशत राशि ही शेष बचती है। यदि कुंभमेले के 30 हजार करोड़ रुपये के बजट पर इस दावे को लागू करें, तो विकास कार्यों के लिए केवल 13 हजार 200 करोड़ रुपये ही बचते हैं।
कुंभ मेले की पारदर्शीता पर सवाल
कुंभ मेला एक विश्वस्तरीय आयोजन है, जिसके लिए सरकार ने खजाना खोल रखा है। हालांकि, पहले भी मंत्रालय के अधिकारी विलास लाड की कथित ऑडियो क्लिप ने कुंभ कार्यों के टेंडर मैनेज करने और करोड़ों के कमीशन के दावों से प्रशासन पर सवालिया निशान खड़े किए थे। हालांकि उस ऑडियो की आधिकारिक जांच अभी जारी है, लेकिन ठेकेदार महासंघ के हालिया आरोपों ने नागरिकों और सामाजिक संगठनों में भारी रोष पैदा कर दिया है।
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‘प्रतिशत संस्कृति’ पर जनता की मांग
विपक्ष और सामाजिक कार्यकर्ता अब सरकार से पारदर्शिता की मांग कर रहे हैं। सवाल यह है कि क्या विकास कार्यों की गुणवत्ता से समझौता किया जा रहा है? नागरिकों का मानना है कि कुंभ जैसे धार्मिक आयोजन के नाम पर खर्च होने वाले जनता के टैक्स के हर एक रुपये का हिसाब सार्वजनिक होना चाहिए, क्या सरकार इस कथित ‘प्रतिशत संस्कृति’ की जांच कर स्पष्ट जवाब देगी, यह अब सबसे बड़ा सवाल है।
