Nashik Watermelon Price Drop: खाड़ी देशों में वाॅर, बंपर पैदावार फिर भी नासिक के तरबूज का हुआ बंटाधार!
Nashik Watermelon Price Drop News: नासिक के बाजारों में तरबूज की कीमतों में भारी गिरावट, बंपर पैदावार के बावजूद मांग घटने से किसान सड़कों पर फल बेचने को मजबूर। लागत निकलना भी हुआ मुश्किल।
- Written By: गोरक्ष पोफली
तरबूज बेचता किसान (सोर्स: सोशल मीडिया)
Watermelon Export Impact: नासिक और आसपास के ग्रामीण इलाकों में तरबूज की पैदावार इस साल बेहतरीन हुई है, लेकिन कीमतों के मोर्चे पर किसानों को बड़ा झटका लगा है। कुछ हफ्तों पहले तक जो तरबूज ऊंचे दामों पर बिक रहा था, उसकी कीमतें अब इतनी गिर चुकी हैं कि किसानों के लिए लागत वसूलना भी नामुमकिन हो गया है। बाजार में भारी आवक और खरीददारों की कमी के कारण तरबूज अब ‘मिट्टी के मोल’ बिक रहा है। हालात इतने खराब हैं कि कई किसान अपनी फसल की तुड़ाई, मजदूरी और ट्रांसपोर्ट का खर्च भी नहीं निकाल पा रहे हैं।
बेमौसम बारिश और युद्ध ने बिगाड़ा मांग का गणित
तरबूज की मांग कम होने के पीछे मुख्य रूप से दो बड़े कारण सामने आ रहे हैं। पहला, नासिक और महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों में हुई बेमौसम बारिश के कारण स्थानीय स्तर पर ठंडे फल की मांग में अचानक कमी आई है। दूसरा और सबसे गंभीर कारण खाड़ी देशों (Gulf Countries) में जारी युद्ध की स्थिति है। नासिक का तरबूज बड़े पैमाने पर इन देशों को निर्यात किया जाता था, लेकिन युद्ध के कारण अंतरराष्ट्रीय रसद (Logistics) प्रभावित हुई है और निर्यात रुक गया है। मांग और निर्यात दोनों ठप होने से व्यापारियों ने किसानों से माल उठाने से इनकार कर दिया है।
सड़कों पर फसल बेचने और फेंकने को मजबूर किसान
व्यापारियों द्वारा पीठ फेर लेने के बाद निराश किसान अब अपना माल सीधे ग्राहकों को बेचने के लिए मजबूर हैं। नासिक की सड़कों के किनारे और छोटे बाजारों में किसान खुद बैठकर बेहद कम कीमतों पर तरबूज बेच रहे हैं। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जिन किसानों का माल नहीं बिक पा रहा है, वे उसे मवेशियों को खिला रहे हैं या सड़कों पर फेंकने की नौबत आ गई है। किसानों का कहना है कि उन्होंने कर्ज लेकर खेती की थी, लेकिन अब उनका आर्थिक गणित पूरी तरह चरमरा गया है।
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बीमा और अनुदान के अभाव में किसान बेसहारा
किसानों के रोष की एक बड़ी वजह सरकारी नीतियों में तरबूज जैसी फसलों की उपेक्षा भी है। तरबूज जैसी बेल वर्गीय फसलों को न तो सरकारी अनुदान के दायरे में रखा गया है और न ही इन्हें फसल बीमा योजना में शामिल किया गया है। इसका मतलब है कि प्राकृतिक आपदा या बाजार में मंदी के कारण होने वाले भारी आर्थिक नुकसान की भरपाई के लिए किसानों के पास कोई सुरक्षा कवच नहीं है। पीड़ित किसानों ने सरकार से मांग की है कि उन्हें विशेष आर्थिक सहायता दी जाए ताकि वे इस संकट से उबर सकें।
