Nashik Forest: नासिक में कचरे का मैदान बना अर्बन फॉरेस्ट, 2.5 एकड़ की बंजर जमीन पर लहलहा रहे 42 हजार पौधे

Nashik Urban Forest: नासिक के देवलाली में 2.5 एकड़ का पुराना डंपिंग मैदान मियावाकी पद्धति से अर्बन फॉरेस्ट में बदल गया है। यहां देशी प्रजातियों के 42 हजार पौधे लगाए गए हैं।
Nashik Deolali Dumping Ground Transformed Into Forest
अभिषेक त्रिपाठी(फोटो नवभारत)
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Dumping Ground To Urban Forest: वर्षों तक कचरे, बदबू और गंदगी से भरा देवलाली छावनी परिषद का 2.5 एकड़ का बंजर मैदान आज हरे-भरे जंगल में तब्दील हो गया है। बारिश के मौसम में जहां कभी कचरे से बहते गंदे पानी के जोहड़ बनते थे, वहाँ अब 42 हजार पौधों का घना अर्बन फॉरेस्ट लहलहा रहा है।

इस बड़े बदलाव को नासिक सामाजिक वानिकी विभाग की महिला वन अधिकारियों और फ्रंटलाइन स्टाफ की टीम ने मुमकिन बनाया है। मियावाकी पद्धति के तहत 140 हेक्टेयर के कुल लक्ष्य में से इस उपेक्षित जमीन को चुनकर, यहां देशी प्रजातियों के 40 से अधिक प्रकार के पौधे लगाए गए हैं।

इस प्रयास में उपयुक्त जमीन का चयन एक बड़ी चुनौती रहा। यह जमीन रक्षा मंत्रालय के अधीन होने के कारण अनुमति प्राप्त करने में काफी मशक्कत करनी पड़ी। आखिरकार, सामाजिक वानिकी विभाग के निरंतर प्रयासों के बाद 2025 में इसके इस्तेमाल की अनुमति मिल गई, जिसके बाद पूरे डंपिंग क्षेत्र को पूरी तरह साफ कराया गया।

क्या है मियावाकी पद्धति?

यह एक जापानी तकनीक है, जिसमें कम जगह में वैज्ञानिक तरीके से तैयार की गई मिट्टी में पौधे एक-दूसरे के बेहद करीब लगाए जाते हैं, ताकि वे तेजी से बढ़कर एक घना और प्राकृतिक जंगल बन सकें। परिक्षेत्र वन अधिकारी सविता पाटील, करुणा पगारे, सुचिता पाटील और सुनिता देशमुख ने महीनों तक इस परियोजना पर कठिन परिश्रम किया है।

छावनी परिषद देवलाली के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अभिषेक त्रिपाठी ने कहा, यह जगह दशकों से बेकार और गंदी पड़ी थी। हमने ठोस कचरा प्रबंधन प्रणाली तो लागू कर दी थी, लेकिन पुराना जमा कचरा वैसा ही था। सामाजिक वानिकी विभाग ने जब इस हरित परियोजना का प्रस्ताव दिया, तो हमने तुरंत अनुमति दे दी।

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असली चुनौती अभी बाकी

42 हजार पौधे लगाना तो सिर्फ एक शुरुआत है, असली चुनौती इन्हें जीवित रखकर बड़ा करना है। मवेशियों से सुरक्षा के लिए बाड़ और ड्रिप सिंचाई प्रणाली लगाना अभी बाकी है।

महिला वन अधिकारियों की टीम का कहना है कि हम लगातार मैदान में डटी हुई हैं और नियमित रूप से पौधों की देखभाल कर रही हैं। आज लहलहाते पौधों को देखकर यह साबित होता है कि सही नीति और दृढ़ संकल्प से कचरे के ढेर को भी नया जीवन दिया जा सकता है।

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