Nashik MHADA Housing Scam: 150 करोड़ के घोटाले में कौन छिपा रहा है बिल्डरों का नाम? बड़े अधिकारी शामिल!

Nashik MHADA Housing Scam 2026: नासिक म्हाडा घोटाले में 194 बिल्डरों पर 154 करोड़ की हेराफेरी का आरोप है। FIR में नाम न होने से सरकारी अधिकारियों की मिलीभगत पर सवाल उठ रहे हैं।
Nashik MHADA Housing Scam 2026
Nashik MHADA Housing Scam 2026 (फोटो क्रेडिट-X)
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Nashik EWS Flat Fraud 194 Builders: नासिक में आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (EWS) के लिए आरक्षित फ्लैटों को लेकर हुए 150 करोड़ रुपये के घोटाले ने महाराष्ट्र की प्रशासनिक और राजनीतिक व्यवस्था को हिलाकर रख दिया है। आरोप है कि बिल्डरों और सरकारी अधिकारियों की मिलीभगत से गरीबों के हक की इन सदनिकाओं को खुले बाजार में बेच दिया गया। म्हाडा (MHADA) और नासिक नगर निगम के अधिकारियों ने सरकारी आदेशों को ताक पर रखकर उन 20 प्रतिशत फ्लैटों की हेराफेरी की, जो एक एकड़ से अधिक के प्रोजेक्ट्स में आरक्षित होने अनिवार्य थे।

इस घोटाले की गूंज दो साल पहले तब सुनाई दी थी, जब राष्ट्रवादी कांग्रेस (SP) के नेता जितेंद्र आव्हाड ने नासिक में 10,000 करोड़ रुपये के फ्लैट घोटाले का दावा किया था। इसके बाद भाजपा विधायकों प्रसाद लाड, प्रवीण दरेकर और निरंजन डावखरे ने विधान परिषद में इस पर लक्षवेधी सूचना उठाई। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के कड़े रुख और जिला कलेक्टर को दिए गए निर्देशों के बाद प्रशासन हरकत में आया, लेकिन अब एफआईआर (FIR) की प्रक्रिया ने नए विवाद को जन्म दे दिया है।

एफआईआर में बिल्डरों के नाम गायब, केवल सर्वे नंबर

हाउसिंग घोटाले की जांच के बाद सरकारवाडा पुलिस स्टेशन में संबंधित पटवारियों (तलाठी) द्वारा मामला तो दर्ज कराया गया है, लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि इसमें किसी भी बिल्डर का नाम शामिल नहीं किया गया है। एफआईआर में केवल उन भूखंडों के सर्वे नंबर दिए गए हैं जहां घोटाला हुआ है। यह आरोप लगाया जा रहा है कि राजस्व विभाग और म्हाडा के अधिकारी जानबूझकर बड़े बिल्डरों के नाम छिपा रहे हैं ताकि उन्हें कानूनी कार्रवाई से बचाया जा सके। जब निर्माण अनुमति और रेकॉर्ड में बिल्डरों के नाम स्पष्ट हैं, तो एफआईआर में उन्हें क्यों छोड़ा गया, यह अब एक बड़ा सवाल बन गया है।

154 करोड़ का गबन और 194 बिल्डर रडार पर

शुरुआती जांच में इस हेराफेरी की कीमत लगभग 154 करोड़ रुपये आंकी गई है, लेकिन जानकारों का मानना है कि इसकी वास्तविक व्याप्ती बहुत बड़ी हो सकती है। इस घोटाले में कुल 194 बिल्डर सीधे तौर पर शामिल बताए जा रहे हैं। नियम के अनुसार, बड़े प्रोजेक्ट्स में 20% घर गरीबों के लिए आरक्षित कर सरकार को सौंपने थे, लेकिन बिल्डरों ने अधिकारियों के साथ साठगांठ कर इन फ्लैटों को म्हाडा को सौंपने के बजाय सीधे बेच दिया। म्हाडा प्रशासन और नगर निगम के उन अधिकारियों पर भी उंगली उठ रही है जिन्होंने बिना फ्लैट हस्तांतरण के प्रोजेक्ट्स को 'कम्प्लीशन सर्टिफिकेट' जारी कर दिए।

मुख्यमंत्री के दखल के बाद भी लीपापोती का प्रयास

महसूल (राजस्व) विभाग के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों पर घोटाले पर पर्दा डालने का आरोप लग रहा है। हालांकि, मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस द्वारा सीधे हस्तक्षेप करने और जिला प्रशासन को कार्रवाई के आदेश देने के बाद मशीनरी सक्रिय हुई, लेकिन एफआईआर की खामियां सरकारी यंत्रणा की मंशा पर संदेह पैदा कर रही हैं। लोक प्रतिनिधियों के दबाव के बाद भी जिस तरह से 'अनाम' एफआईआर दर्ज की गई है, उससे स्पष्ट है कि पर्दे के पीछे से रसूखदार बिल्डरों को बचाने का प्रयास जारी है। अब मांग उठ रही है कि मामले की जांच किसी स्वतंत्र एजेंसी से कराई जाए ताकि असली दोषियों के नाम उजागर हो सकें।

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