महाराष्ट्र सरकार के जीआर से बढ़ा दिव्यांगों का संकट: अस्थायी प्रमाण पत्र धारकों को नहीं मिलेगा योजनाओं का लाभ
Nashik Divyang News: दिव्यांग सशक्तिकरण विभाग के नए जीआर से अस्थायी प्रमाण पत्र वाले दिव्यांगों का मानधन और सरकारी लाभ बंद हो गया है। सामाजिक संगठनों ने इस पर पुनर्विचार की मांग की है।
- Written By: रूपम सिंह
दिव्यांग (फोटो सोर्स-सोशल मीडिया)
Nashik Divyang Empowerment Department News: राज्स सरकार के दिव्यांग सशक्तिकरण विभाग द्वारा जारी नए शासनादेश (जीआर) ने राज्य के हजारों दिव्यांगों और उनके परिवारों की चिंता बढ़ा दी है। नए नियमों के अनुसार, जिन दिव्यांग व्यक्तियों के पास ‘अस्थायी दिव्यांगता प्रमाण पत्र’ है, उन्हें अब किसी भी सरकारी योजना, रियायत या मासिक भत्ते (मानधन) का लाभ नहीं दिया जाएगा। विभाग के इस फैसले के बाद अब केवल ‘स्थायी’ दिव्यांगता प्रमाण पत्र धारक ही सरकारी सुविधाओं के पात्र माने जाएंगे।
सरकार ने ‘राइट्स ऑफ पर्सन्स विद डिसेबिलिटीज एक्ट’ के तहत 21 प्रकार की दिव्यांगताओं को सरकारी योजनाओं के लिए पात्र घोषित किया है, लेकिन इस नए फैसले से जमीनी स्तर पर एक बड़ी विसंगति पैदा हो गई है। वास्तविकता यह है कि कई दिव्यांगताओं में सिविल सर्जन द्वारा शुरुआत में स्थायी प्रमाण पत्र जारी नहीं किया जाता है। मासिक भत्ता भी हो जाएगा बंद इस नए कड़े नियम के कारण जिन हजारों दिव्यांगों के पास वर्तमान में अस्थायी प्रमाण पत्र हैं, उनका मासिक भत्ता और मिलने वाली अन्य जरूरी सुविधाएं तत्काल प्रभाव से बंद हो गई हैं।
प्रशासन का कहना है कि फर्जी लाभार्थियों की पहचान करने और प्रशासनिक व्यवस्था को सुगम बनाने के लिए केवल स्थायी दिव्यांगता वाले व्यक्तियों को ही योजनाओं का लाभ देने की नीति बनाई गई है। हालांकि, चिकित्सा नियमों के अनुसार बौद्धिक अक्षमता, स्वलीनता, सेरेब्रल पाल्सी और सीखने की अक्षमता से पीड़ित बच्चों को शुरुआत में आमतौर पर केवल 5 वर्षों के लिए अस्थायी प्रमाण पत्र ही दिया जाता है। इस नए नियम का सबसे बड़ा असर 5 से 18 वर्ष के आयु वर्ग के विशेष बच्चों पर पड़ रहा है।
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बच्चों और किशोरों को होगा अधिक नुकसान
नियमानुसार, इन बच्चों को उम्र के 18 वर्ष पूरे होने के बाद ही स्थायी प्रमाण पत्र मिल सकता है। ऐसे में नए आदेश के कारण इन बच्चों को सरकारी मदद से वंचित कर दिया गया है। अभिभावकों के सामने अब यह गंभीर सवाल खड़ा हो गया है कि वे अपने बच्चों की महंगी थेरेपी, विशेष शिक्षा और नियमित उपचार का खर्च अकेले कैसे उठाएंगे।
सामाजिक संस्थाओं और विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय सरकारी नौकरियों में मिलने वाले आरक्षण के लिए तो उचित हो सकता है, ताकि इसका दुरुपयोग न हो, लेकिन सामाजिक सुरक्षा और कल्याणकारी योजनाओं से इस वर्ग को पूरी तरह बाहर कर देना अत्यंत असंवेदनशील है।
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पुनर्विचार की पुरजोर मांग
चौतरफा हो रही आलोचना के बीच सामाजिक संगठनों ने सरकार से मांग की है कि इस ‘असंवेदनशील’ फैसले पर तुरंत पुनर्विचार किया जाए। एक तरफ सरकार समावेशी शिक्षा और समाज का दावा करती है। वहीं, दूसरी तरफ वास्तविक जरूरतमंद बच्चों को योजनाओं से दूर रखना इस नीति के बिल्कुल विपरीत है। अतः सरकार को इस नियम में बदलाव कर अस्थायी प्रमाण पत्र वाले बच्चों को दोबारा राहत देनी चाहिए।
