Nashik Water Crisis: कादवा नदी का सीना सूखा, प्यास से तड़प रहे बेजुबान, क्या प्रशासन सुनेगा दिंडोरी की पुकार?
Leopard Terror Dindori: नासिक जिले के दिंडोरी तहसील में 40 डिग्री तापमान के बीच कादवा नदी सूखी। पशु-पक्षी बेहाल, प्यास की तलाश में तेंदुए बस्तियों में घुस रहे है।
- Written By: गोरक्ष पोफली
जलसंकट की प्रतीकात्मक फोटो (सोर्स: सोशल मीडिया)
Kadwa River Dry Dindori: महाराष्ट्र के नासिक जिले के अंतर्गत आने वाली दिंडोरी तहसील में इस समय कुदरत का कहर और प्रशासनिक अनदेखी एक साथ देखने को मिल रही है। क्षेत्र में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच चुका है, जिसके परिणामस्वरूप जीवनदायिनी मानी जाने वाली कादवा नदी का पात्र पूरी तरह से सूख चुका है। नदी के सूखने से न केवल कृषि और पीने के पानी का संकट पैदा हो गया है, बल्कि पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) को भी भारी नुकसान पहुँच रहा है।
दम तोड़ते जलचर और मवेशियों का संकट
कादवा नदी (Kadwa River) में पानी की एक बूंद न बचने के कारण मछली और अन्य जलचर प्राणी दम तोड़ रहे हैं, जो अब आसमान में मंडराते पक्षियों का आसान शिकार बन रहे हैं। स्थिति इतनी गंभीर है कि करंजवण, ओझे, म्हेलुस्के और लखमापुर जैसे गांवों में पालतू मवेशियों के लिए पीने के पानी का एक भी स्रोत शेष नहीं बचा है। स्थानीय ग्रामीण और किसान अब सरकार से मांग कर रहे हैं कि करंजवण बांध से तत्काल नदी में पानी छोड़ा जाए।
तेंदुओं का आतंक
कादवा नदी (Kadwa River) का तटीय क्षेत्र गन्ने की खेती के लिए प्रसिद्ध है, जो तेंदुओं का सुरक्षित ठिकाना माना जाता है। नदी सूखने के कारण वन्यजीवों के सामने पानी का गंभीर संकट खड़ा हो गया है। प्यास बुझाने की तलाश में अब तेंदुओं ने रिहायशी बस्तियों, वाडियों और ढाणियों का रुख कर लिया है। रात के अंधेरे में तेंदुए घरों के बाहर रखी पानी की टंकियों तक पहुँच रहे हैं, जिससे ग्रामीणों में भारी दहशत है। इसके अतिरिक्त, राजस्थान से आए काठेवाड़ी चरवाहों और साक्री-पिंपलनेर के गडरियों के लिए भी अपने सैकड़ों पशुधन को जीवित रखना मुश्किल हो रहा है।
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सिंचाई विभाग पर भेदभाव का आरोप
स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता सचिन बर्डे और अन्य ग्रामीणों ने सिंचाई विभाग की भूमिका पर कड़े सवाल उठाए हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि करंजवण बांध हर साल शत-प्रतिशत भरने के बावजूद दिंडोरी की जनता प्यासी रह जाती है। आरोप यह भी है कि जब भी येवला, निफाड या मनमाड जैसे क्षेत्रों से मांग आती है, तो विभाग तुरंत पानी छोड़ देता है, लेकिन स्थानीय तहसील की जरूरतों को बार-बार नजरअंदाज किया जाता है। ग्रामीणों ने प्रशासन से पूछा है कि “क्या अपनी प्यास बुझाने के लिए भी हमें दूसरों की अनुमति या मांग का इंतजार करना होगा?”
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जलापूर्ति योजनाएं ठप
नदी सूखने का सीधा असर गांवों की सरकारी जलापूर्ति योजनाओं पर पड़ा है। कुओं और बोरवेल का जलस्तर काफी नीचे चला गया है, जिससे आने वाले दिनों में स्थिति और भयावह होने की आशंका है। ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि प्रशासन ने जल्द ही करंजवण बांध से नदी में पानी नहीं छोड़ा, तो वे उग्र आंदोलन करने के लिए मजबूर होंगे।
