नासिक में ऑटो चालकों और एग्रीगेटर कंपनियों की मनमानी, ₹30 प्रति किमी किराया वसूलने से जनता में भारी आक्रोश
Nashik Auto Rickshaw: नासिक में ईंधन की आड़ में ऑटो चालकों द्वारा ₹30/किमी का मनमाना किराया वसूलने और ओला-ऊबर की मनमानी से जनता परेशान है। यातायात विभाग की निष्क्रियता से रोष बढ़ रहा है।
- Written By: रूपम सिंह
नासिक ऑटो चालक ,(सोर्स: सोशल मीडिया)
Nashik Auto Rickshaw Fare Hike Controversy: नासिक शहर में ऑटो रिक्शा चालकों द्वारा मनमाना किराया वसूलने और प्रति किलोमीटर के लिए मोटी रकम ऐंठने को लेकर नासिक वासियों में भारी आक्रोश देखा जा रहा है। पेट्रोल और गैस की बढ़ती कीमतों को ढाल बनाकर ऑटो चालकों और निजी एग्रीगेटर कंपनियों ने आम नागरिकों का सफर दूभर कर दिया है।
ऑटो चालकों द्वारा न्यूनतम किराया 30 रुपये प्रति किलोमीटर कर दिया गया है, जो सीधा यात्रियों से लूट जैसा है। आश्चर्य की बात यह है कि यातायात विभाग इस खुली लूट पर मूकदर्शक बना बैठा है, जिससे नागरिकों में प्रशासन के खिलाफ तीव्र नाराजगी है। ईंधन के दामों का बहाना सिर्फ एक छलावा।
हालिया आंकड़ों के अनुसार, नासिक में रविवार को पेट्रोल 112.44 प्रति लीटर और सीएनजी 93.65 रुपये प्रति किलो के स्तर पर है। वहीं, घरेलू एलपीजी सिलेंडर की कीमत 916.50 (यानी लगभग 64.54 प्रति किलो) है। ईंधन के इन दामों को आधार बनाकर ऑटो संगठन किराए में बढ़ोतरी को सही ठहरा रहे हैं। लेकिन अगर ऑटो रिक्शा के माइलेज के गणित को समझें, तो यह बहाना पूरी तरह खोखला साबित होता है।
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नासिक की सड़कों पर दौड़ने वाले पेट्रोल ऑटो रिक्शा का औसत माइलेज 25 से 30 किलोमीटर प्रति लीटर है। वहीं सीएनजी पर चलने वाले ऑटो का माइलेज 35 से 40 किलोमीटर प्रति किलो तक आता है।
एक लीटर में 30 KM दौड़ता है रिक्शा
नागरिकों का सीधा और तार्किक सवाल है कि यदि कोई नासिक ऑटो सीएनजी या पेट्रोल पर एक लीटर प्रति किलो में न्यूनतम 30 किलोमीटर भी चलता है, तो उसकी वास्तविक ईंधन लागत 3 से 4 रुपये प्रति किलोमीटर के आसपास आती है। ऐसे में ऑटो चालकों द्वारा न्यूनतम किराया ही 30 रुपये प्रति किलोमीटर मांगना सरासर अन्याय और खुली लूट है।
ओला, ऊबर और रैपिडो भी नहीं दे रहे यात्रियों को राहत
स्थानीय ऑटो चालकों की दादागिरी से परेशान होकर जब लोग निजी एग्रीगेटर कंपनियों जैसे ओला, ऊबर और रैपिडो का रुख करते हैं, तो वहां स्थिति और भी बदतर मिलती है। इन ऐप-आधारित कंपनियों के किराए सामान्य ऑटो से भी कहीं अधिक है।
पीक आवर्स में सर्ज प्राइजिंग के नाम पर ये कंपनियां मनमाना किराया वसूल रही है, जिससे मध्यमवर्गीय और नौकरी पेशा नागरिकों का मासिक बजट पूरी तरह चरमरा गया है। स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि ऑटो चालकों के विभिन्न संगठन इस अवैध वसूली को रोकने के बजाय उन्हें गैर-कानूनी समर्थन दे रहे हैं। यात्रियों से बदसलूकी और मीटर से चलने से इनकार करना अब नासिक में आम बात हो गई है। इस पूरे मामले में सबसे निराशाजनक भूमिका शहर के यातायात विभाग की रही है।
नासिक वासियों की प्रमुख मांगें
नियमों के उल्लंघन और ओवरचार्जिंग की लगातार शिकायतों के बावजूद प्रशासन की ओर से कोई ठोस कार्रवाई या जमीनी स्तर पर चेकिंग अभियान नहीं चलाया जा रहा है। प्रति किलोमीटर टैरिफ तय हो यातायात विभाग तुरंत हस्तक्षेप करे और शहर के भीतर प्रति किलोमीटर के हिसाब से एक सख्त और पारदर्शी टैरिफ कार्ड लागू करे।
मीटर अनिवार्य हो
नासिक शहर के हर कोने में मीटर प्रमाणिकता की जांच हो और बिना मीटर या मनमाने किराए पर चलने वाले ऑटो पर भारी जुर्माना लगाया जाए, ऑनलाइन एग्रीगेटर्स पर लगाम ओला, ऊबर जैसी निजी कंपनियों के किराए के लिए भी प्रशासन एक अधिकतम सीमा (क्रेप प्राइस) तय करे। बढ़ती महंगाई के इस दौर में सार्वजनिक परिवहन आम आदमी की जीवनरेखा है। यदि यातायात विभाग ने जल्द ही ऑटो चालकों की इस मनमानी और संगठनों की दादागिरी पर नकेल नहीं कसी, तो नागरिकों का यह आक्रोश जल्द ही सड़कों पर बड़े आंदोलन का रूप ले सकता है।
