नागपुर वन्यजीवों के लिए ‘संजीवनी’ बना सेमिनरी हिल्स का TTC; 6 महीनों में 1,139 जानवरों-पक्षियों की बचाई जान!
Nagpur Wildlife: नागपुर के ट्रांजिट ट्रीटमेंट सेंटर ने छह महीनों में 1,139 घायल वन्यजीवों का उपचार कर उन्हें फिर से जंगल में छोड़ा। बढ़ते मानव-वन्यजीव संघर्ष के बीच यह केंद्र संरक्षण की अहम कड़ी है।
- Written By: अंकिता पटेल
नागपुर वन्यजीव, ट्रांजिट ट्रीटमेंट सेंटर, वन्यजीव उपचार,प्रतीकात्मक तस्वीर (सोर्स-सोशल मीडिया)
Nagpur Wildlife Transit Treatment Centre: नागपुर जिले में जंगल कटने के कारण वन्यजीवों के आवास नष्ट हो रहे हैं। इस कारण जंगली जानवर मानव बस्तियों तक पहुंच रहे हैं। ऐसे में कई बार मानव वन्यजीव संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। कई बार वन्यजीव जख्मी होकर दम तोड़ देते हैं। ऐसे में ट्रांजिट ट्रीटमेंट सेंटर (टीटीसी) वन्यजीवों के लिए संजीवनी साबित हो रहा है।
बीते लगभग 6 महिनों में कुल 1,139 वन्यजीवों का टीटीसी द्वारा सफल उपचार कर उन्हें जंगलों में निसर्ग मुक्त कर दिया गया। उपचार के बाद जंगलों में छोड़े गए वन्यजीवों में 209 प्राणी, 250 सरीसृप और कुल 680 पक्षियों का समावेश है।
इनमें बाघ, तेंदुए, चीतल, बंदर समेत अनके प्रजाति के पक्षियां शामिल हैं। सेमिनरी हिल्स क्षेत्र में स्थित ट्रांजिट ट्रीटमेंट सेंटर भारत में जंगली जानवरों, पक्षियों और सरीसृपों के लिए अपनी तरह का पहला आपातकालीन उपचार केंद्र है।
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घायल जानवरों और पक्षियों के बचाव और उपचार की प्रक्रिया को गति देने के उद्देश्य से टीटीसी की शुरुआत दिसंबर 2015 में की गई थी। मानक प्रक्रिया में जहां टीटीसी नहीं होता, वहां डॉक्टरों और अधिकारियों को घायल जानवरों को बचाने में कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
प्राणियों के बचने की संभावना बढ़ी
जंगली जानवरों के उपचार के लिए कोई विशिष्ट बुनियादी ढांचा नहीं था जिसके परिणामस्वरूप संक्रामक रोगों का प्रसार होता था। इसके अलावा बचाव और उपचार के लिए समर्पित कर्मचारियों की कमी के कारण जानवरों को बचाने की संभावना कम हो जाती थी।
टीटीसी ने अपनी त्वरित प्रक्रिया और समर्पित कर्मचारियों के साथ इन समस्याओं को दूर किया और जानवर, पक्षी या सरीसृप को बचाने की संभावनाओं को काफी हद तक बढ़ा दिया।
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3 विभागों में किया जाता है काम
टीटीसी 3 विभागों में काम करता है। इनमें बचाव, उपचार और प्राकृतिक आवास में छोड़ना शामिल है। यह विभाग संकटग्रस्त जानवरों को बचाता है, फिर उन्हें विशेष सुविधाओं में उपचारित करता है और उसके बाद उनके प्राकृतिक आवास में छोड़ देता है। यदि कोई जानवर, पक्षी या सरीसृप विकलांग हो जाता है तो उसे गोरेवाड़ा वन्यजीव केंद्र में स्थानांतरित कर दिया जाता है जहां उसकी देखभाल की जाती है।
