

Maharashtra Illegal Pathology Labs Case: नागपुर राज्य में मौजूद लगभग 13,000 पैथोलॉजी लैब में से करीब 8,000 (लगभग 70%) लैब के अवैध रूप से संचालित होने का चौंकाने वाला दावा किया गया है। इस गंभीर मसले पर सामाजिक कार्यकर्ता दिगंबर पचगाडे ने हाई कोर्ट में एक फौजदारी जनहित याचिका दायर की है जिस पर सुनवाई करते हुए न्यायाधीश अनिल किलोर और न्यायाधीश रजनीश व्यास ने राज्य सरकार के 'ढुलमुल और टालमटोल' वाले रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई है।
सोमवार को मामले पर हुई सुनवाई के दौरान अतिरिक्त सरकारी वकील ने अदालत को जानकारी दी कि सार्वजनिक स्वास्थ्य विभाग 'क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट' के पुराने प्रावधानों में संशोधन कर एक नया कानून लाने की तैयारी कर रहा है। इस युक्तिवाद को संज्ञान में लेते हुए हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को कड़े निर्देश दिए हैं। न्यायालय ने सरकार को नया कानून बनाने की प्रक्रिया की वर्तमान स्थिति स्पष्ट करते हुए एक हलफनामा दाखिल करने का आदेश दिया है। इसके लिए सरकार को एक सप्ताह की मोहलत दी गई है और मामले की अगली सुनवाई 31 अगस्त को तय की गई है।
इससे पहले हुई सुनवाइयों में राज्य सरकार ने अदालत में खुद यह स्वीकार किया था कि 'क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट' को राज्य में प्रभावी ढंग से लागू नहीं किया जा सका है। न्यायालय द्वारा अपना लिखित पक्ष स्पष्ट करने के लिए बार-बार समय दिए जाने के बावजूद सरकार की ओर से कोई ठोस जवाब नहीं आया। इस पर हाई कोर्ट ने सरकार के कामकाज पर 'लापरवाही' का ठप्पा लगाते हुए कड़ी फटकार लगाई थी।
सोमवार को हुई सुनवाई में भी सरकार का वही उदासीन रवैया देखने को मिला जिससे न्यायालय ने एक बार फिर तीव्र नाराजगी व्यक्त की। कोर्ट ने इस मामले को बेहद गंभीर करार देते हुए टिप्पणी की कि यह मुद्दा सीधे तौर पर आम जनता के स्वास्थ्य से जुड़ा हुआ है। इसी वजह से अदालत ने एक सप्ताह के भीतर हर हाल में हलफनामा पेश करने के सख्त निर्देश दिए हैं।
इस पूरे प्रकरण की सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि राज्य में चल रही पैथोलॉजी लैब्स के बारे में खुद स्वास्थ्य विभाग के पास कोई आधिकारिक या विश्वसनीय जानकारी उपलब्ध नहीं है। याचिकाकर्ता ने सूचना के अधिकार के तहत डीएमएलटी (DMLT) और ओएमएलटी (OMLT) योग्यता धारकों द्वारा शुरू की गई पैथोलॉजी लैब की जिला स्तरीय जानकारी मांगी थी।
इस आरटीआई के जवाब में स्वास्थ्य विभाग के अस्पताल निदेशालय ने यह स्वीकार किया कि उनके पास ऐसा कोई भी रिकॉर्ड या पंजीकरण उपलब्ध नहीं है। विभाग के इस जवाब से यह पूरी तरह स्पष्ट हो जाता है कि राज्य भर में कुकुरमुत्ते की तरह खुल रहीं निजी प्रयोगशालाओं पर प्रशासन का कोई भी नियंत्रण नहीं रह गया है।