ऑरेंज सिटी बनी ‘ई-रिक्शा सिटी’! नागपुर में सड़क पर चलना बन गया खतरा, नागरिक परेशान
Nagpur News: नागपुर की सड़कों पर ई-रिक्शा का कब्जा, ट्रैफिक अव्यवस्था चरम पर। प्रशासन मौन धारण किए हुए है। शहर अब ‘ई-रिक्शा सिटी’ बन गया है, जिससने नागरिक परेशान हो रहे है।
- Written By: प्रिया जैस
परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक (सौजन्य-सोशल मीडिया)
Nagpur Latest News: सावधान रहें, सुरक्षित रहें… क्योंकि पीछे से ‘बैटरी वाला वीर’ आ रहा है। जी हां, कभी संतरों की मीठी खुशबू और शांत चौड़ी सड़कों के लिए मशहूर हमारा ‘ग्रीन सिटी’ नागपुर अब एक नई पहचान गढ़ रहा है-‘थ्रिलर ट्रैफिक’ का ग्लोबल हेडक्वार्टर!
अगर आपको लगता है कि शहर का ट्रैफिक जाम बढ़ती आबादी या अधूरी मेट्रो लाइनों की वजह से है तो अपनी जनरल नॉलेज अपडेट कर लीजिए। असली ‘क्रांतिकारी’ तो ये साइलेंट ई-रिक्शा हैं जो किसी अदृश्य जादुई शक्ति की तरह अचानक आपके सामने प्रकट होते हैं और गायब हो जाते हैं।
गली-गली में ‘फॉर्मूला वन’ का रोमांच
नागपुर के सीताबर्डी, इतवारी और महल जैसे व्यापारिक इलाकों में गाड़ी चलाना अब ‘खतरों के खिलाड़ी’ के स्टंट से कम नहीं है। इन ई-रिक्शों की सबसे बड़ी खासियत इनकी ‘इलास्टिक फ्लेक्सिबिलिटी’ है। ये न सिग्नल को अपना सगा मानते हैं, न ही इन्हें साइड मिरर जैसी ‘फालतू’ चीजों की जरूरत है।
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इनके ड्राइवरों का दृढ़ विश्वास है कि सड़क पर बाकी सब ‘किरायेदार’ हैं और वे खुद ‘पुश्तैनी मालिक।’ बीच सड़क पर बिना किसी संकेत के अचानक ‘इमरजेंसी ब्रेक’ मारकर सवारी बिठाना इनका जन्मसिद्ध अधिकार है। पीछे आ रहीं गाड़ियों की लंबी कतार में खड़ा व्यक्ति भले ही मोक्ष की कामना करने लगे, पर इन ‘बैटरी पुत्रों’ के चेहरे पर शिकन तक नहीं आती।
यहां ‘ई-रिक्शा’ ही ‘सुप्रीम कोर्ट’ है…
- शहर के कई ऐसा एरिया जहां कभी स्कूल और अस्पतालों की शांति हुआ करती थी, वहां अब ई-रिक्शों का ‘मछली बाजार’ सजता है।
- मरीज एम्बुलेंस से पहुंचे न पहुंचे, ई-रिक्शा अस्पताल के गेट के ठीक सामने तिरछा खड़ा होकर रास्ता रोकने में जरूर सफल हो जाता है।
- वहीं शहर की संकरी गलियों का तो कहना ही क्या। यहां ई-रिक्शा चालक अपनी गाड़ी को किसी ‘सुई’ की तरह ट्रैफिक के धागे में पिरो देते हैं।
- शहर की रेलवे क्रॉसिंग और व्यस्त सिग्नलों पर इनका जमावड़ा ऐसा होता है मानो कोई राजनीतिक रैली निकल रही हो। मोड़ पर ये ऐसे मुड़ते हैं जैसे सड़क नहीं बल्कि उनके घर का आंगन हो।
- पीछे वाले की गाड़ी घिसे या उसका दिल बैठे, ई-रिक्शा चालक अपनी ‘बैटरी की शक्ति’ के अहंकार में मग्न आगे बढ़ जाते हैं।
ट्रैफिक नियमों को ‘हाई वोल्टेज’ करंट
इन ‘बैटरी वाले वीरों’ ने नागपुर ट्रैफिक पुलिस के धैर्य की ऐसी परीक्षा ली है जिसे पास करना ‘यूपीएससी’ से भी कठिन है। एक नन्हें से ई-रिक्शा में क्षमता से अधिक सवारियां ऐसे ठूंसी होती हैं जैसे किसी ट्रैवल बैग में जबरदस्ती आखिरी मिनट पर फटे-पुराने कपड़े भरे गए हों। ऊपर से इनकी ‘साइलेंट’ मोटर।
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ये इतनी खामोशी से आपके पीछे आकर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ करते हैं कि आपको पता भी नहीं चलेगा कि कब आपकी चमचमाती कार का बम्पर उनके रिक्शे से ‘परमानेंट रिलेशनशिप’ में आ गया। इनके लिए ‘नो एंट्री’ महज एक सुझाव है और ‘वन-वे’ तो इनके लिए बना ही नहीं है। अगर आप इनसे नियम की बात करें तो ये आपको ऐसी दार्शनिक नजरों से देखेंगे जैसे आपने किसी दूसरे ग्रह की भाषा बोल दी हो।
मंत्रालय, प्रशासन का ‘मौन व्रत’
ऐसा नहीं है कि इन बैटरी वालों वीरों यानी ई-रिक्शा चालकों की मनमानी से परिवहन मंत्रालय या संबंधित विभाग परिचित न हो लेकिन सख्ती बरतेगा कौन, इनके लिए नियम-कानून बनायेगा कौन। कहीं बैटरी के पानी से हाथ जल गया तो…
वर्तमान नजारा देखकर यही लगता है कि जैसे परिवहन मंत्रालय, आरटीओ से लेकर ट्रैफिक पुलिस शायद इस ‘ई-क्रांति’ को देखकर इतने गद्गद् और भावुक हो गए हैं कि उन्होंने अपनी आंखें पूरी तरह मूंद ली हैं।
किस्मत के भरोसे नागपुरकर
आज के दौर में अगर आप नागपुर की सड़कों पर सुरक्षित, बिना किसी खरोंच के और बिना बीपी बढ़ाए घर पहुंच जाते हैं तो इसे अपनी ड्राइविंग स्किल नहीं बल्कि ‘चमत्कार’ और अपनी ‘किस्मत’ समझिए। जब तक इन ‘बेकाबू’ ई-रिक्शों के लिए कोई ठोस नीति, रजिस्ट्रेशन और रूट तय नहीं होते, तब तक नागपुरकर इसी तरह ‘बैटरी’ के झटकों के साथ अपनी जान हथेली पर रखकर सफर करते रहेंगे।
- नवभारत लाइव पर नागपुर से सतीश दंडारे की रिपोर्ट
