नागपुर के ‘सूरमा’ संगठन आखिर गायब कहां हैं? जनता कतारों में और पदाधिकारी एयरकंडीशन कमरों में खामोश!
Nagpur Trade Unions Silence: नागपुर के संगठनों की 'रहस्यमयी' चुप्पी! पेट्रोल-डीजल और गैस के लिए घंटों कतार में खड़ी रही जनता, पर सैकड़ों संगठनों ने क्यों साधी मौन? पढ़ें विशेष रिपोर्ट।
- Written By: प्रिया जैस
गैस सिलेंडर (फाइल फोटो)
Fuel Shortage Nagpur Public Anger: ऐसा काफी कम देखने को मिलता है, जब इतनी बड़ी समस्या हो और सभी के सभी संगठन चुप्पी साधे हुए हों। कहीं से कोई आवाज ‘छन्न’ कर भी बाहर नहीं निकल रही हो। युद्ध के कारण शहर के लोग छटपटाते रहे। पेट्रोल-डीजल से लेकर गैस तक की किल्लत झेलते रहे। लंबी-लंबी कतारें लगीं, लेकिन एक भी संगठन इन मुद्दों को लेकर सामने नहीं आया।
सुगबुगाहट सभी जगह देखने को मिली। क्या होटल और क्या उद्योग सभी जगह परेशानी थी। लोगों को गैस सिलेंडर हासिल करने में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा था, परंतु आवाज किसी ने भी बुलंद नहीं की। यह कोई ‘घोर रहस्य’ से कम नहीं है।
होटल, उद्योग, व्यापार, पेट्रोल-डीजल, गैस, कैमिकल, ग्राहक पंचायत, ग्राहक हक, राशन-किरोसिन, कृषि से लेकर तमाम चीजों का प्रतिनिधित्व करने वाले संगठन में शहर में हैं। राष्ट्रीय स्तर से लेकर राज्य स्तर और फिर लोकल स्तर से लेकर प्रभाग स्तर पर काम करने वाले संगठनों की आवाज सुनने को मिल जाती थी, लेकिन इस बार एक भी संगठन सामने नहीं आया।
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ऐसा भी नहीं था कि समस्या छोटी थी, व्यक्तिगत थी। सभी हिले हुए थे। शहर के कई घरों में खाना नहीं बन पा रहा था, तो कई लोगों के वाहनों के पहिये थम गए थे। काम धंधा छोड़ लोग गैस गोदामों में दिन भर लंबी-लंबी कतारें लगाकर धूप में खड़े रहे। मजबूरी में लोगों ने पेट्रोल पंपों पर 3-3 घंटे बिताए, लेकिन किसी का भी दिल नहीं पिघला।
गर्मी में ‘पिघला’ दिल
संगठनों की चुप्पी देखकर शहर के नागरिक सवाल कर रहे हैं कि रोजाना विविध समस्याओं को लेकर प्रशासनिक अधिकारियों, नेताओं तक पहुंचने वाले ये ‘पदाधिकारी’ आखिर गायब कहां हो गए हैं। क्या गर्मी में सभी ‘पिघल’ गए हैं या उनके सामने कुछ मजबूरी आ गई है। नागरिकों का सवाल यह है कि जब ‘अपने’ पर आती है तो एकदम छोटी-छोटी समस्याएं उनके लिए बड़ी हो जाती हैं, लेकिन जनता को कतारों में खड़ा देख उनका दिल क्यों नहीं पसीजा। आखिर इन्होंने अपनी ओर से प्रयास क्यों नहीं किए।
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सैकड़ों संगठन, सभी गायब
नागपुर शहर में एक संगठन टूटता है, तो 3-4 संगठन नए बन जाते हैं। हर चीज के लिए कई स्तरों के संगठन यहां पर कार्यरत हैं। कुछ बहुत एक्टिव हैं, तो कुछ कागजों पर। संगठन और पदाधिकारियों की कोई कमी नहीं है। सैकड़ों की संख्या में संगठनों की गिनती की जा सकती है, परंतु इस बार सभी के सभी ‘खामोश’ वाली मुद्रा में दिखे। नागरिकों में यही चर्चा का विषय बना हुआ है।
होटल वाले 2000 रुपये का सिलेंडर 5000 रुपये में खरीदते रहे। मेन्यू कार्ड को छोटा करते चले गए। अब भी स्थिति बहुत नहीं सुधरी है, परंतु इस बार संगठन ने ‘समझदारी’ से काम निकाला है। बिना बोले ‘ब्लैक’ में सिलेंडर लेते रहे, लेकिन जनता के लिए आवाज बुलंद करने में चूक गए। उद्योग वाले गैस की जगह कोयले पर निर्भर हो गए, लेकिन छोटे से बड़े संगठनों की ‘बोलती बंद’ रही। व्यापारियों की बात ही निराली रही।
